साइड स्टोरी: 'अपनों की बेरुखी के साथ जब हाथ से 'हाथ' छूटा और 'झाड़ू' बिखरी', भाजपा ले गई फायदा
चंडीगढ़ मेयर चुनाव में आप और कांग्रेस की आपसी खींचतान से भाजपा को फायदा मिला। विपक्षी एकता की कमी ने चुनावी नतीजा बदल दिया।
-विपक्ष के पास संख्या थी, लेकिन भरोसा नहीं
-आप-कांग्रेस की आपसी खींचतान से भाजपा को मिला फायदा
-चंडीगढ़ मेयर चुनाव ने विपक्षी एकता की पोल खोली
इसे राजनीति की विडंबना कहें या रणनीतिक चूक, लेकिन चंडीगढ़ नगर निगम में 'इंडिया गठबंधन' (INDIA Alliance) की जो प्रयोगशाला पिछले साल लोकतंत्र की दुहाई दे रही थी, आज उसी की राख पर भाजपा ने अपनी जीत का कमल खिलाया है। मेयर चुनाव की बिसात बिछी तो भाजपा के खिलाफ संख्याबल मौजूद था, लेकिन मैदान में न तो वो एकता दिखी और न ही वो संकल्प।
भरोसे की वो टूटी कड़ी पिछले साल जब सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया था, तब 'आप' और 'कांग्रेस' एक सुर में लोकतंत्र की रक्षा की बात कर रहे थे। लेकिन इस बार सदन के भीतर की तस्वीर जुदा थी। जब कांग्रेस उम्मीदवार गुरप्रीत सिंह गाबी के लिए हाथ उठाने की बारी आई, तो आम आदमी पार्टी के पार्षदों के हाथ कुर्सी से चिपके रहे।
सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह 'बदले की राजनीति' थी। 'आप' को उम्मीद थी कि कांग्रेस उनके उम्मीदवार योगेश ढींगरा के लिए रास्ता साफ करेगी, लेकिन जब बात नहीं बनी, तो 'आप' ने कांग्रेस का साथ न देकर भाजपा की राह आसान कर दी।
'वॉकआउट' का बहाना या हार का डर?
कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार की वोटिंग के बाद सदन से वॉकआउट कर दिया। यह कदम भाजपा को रोकने के लिए नहीं, बल्कि अपनी साख बचाने की एक कोशिश ज्यादा नजर आया। कांग्रेस के 7 वोटों के बाहर जाते ही जादुई आंकड़ा भाजपा के करीब पहुंच गया। सौरभ जोशी की जीत उसी पल तय हो गई थी जब विपक्षी खेमा दो फाड़ हुआ।
रामचंद्र यादव: बगावत और फिर मजबूरी का वोट
पार्टी से नाराज चल रहे आप पार्षद रामचंद्र यादव ने वोट तो योगेश ढींगरा को दिया, लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज बता रही थी कि यह समर्थन केवल 'व्हीप' के डर से था। विपक्षी एकता में पड़ी यह दरार इतनी चौड़ी थी कि एक-दो बागी सुरों का मिलना भी हार को टाल नहीं सका।
भाजपा की 'वेट एंड वॉच' नीति जहाँ विपक्ष आपस में उलझा था, भाजपा ने 'साइलेंट किलर' की भूमिका निभाई। सौरभ जोशी का संयम और भाजपा की एकजुटता उनके 18 वोटों में साफ झलकी। भाजपा जानती थी कि उसे केवल अपने कुनबे को संभालना है, विपक्षी गठबंधन तो अपनी ही महत्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबकर दम तोड़ देगा।
यह सबक जो 2027 की राह दिखाएगा
चंडीगढ़ के इस नतीजे ने एक स्पष्ट संदेश दिया है—अगर विचारधारा से ऊपर केवल सत्ता का स्वार्थ होगा, तो गठबंधन ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। सौरभ जोशी के पास अब 300 दिन हैं अपनी काबिलियत साबित करने के लिए, लेकिन कांग्रेस और आप के पास आत्ममंथन के लिए लंबा वक्त है कि आखिर वे साथ होकर भी इतने दूर कैसे हो गए?
Akhil Mahajan