जनसभा और धरना-प्रदर्शन पर रोक हटाई जाए, अभय चौटाला ने CM नायब सैनी को लिखा पत्र

अभय चौटाला ने मुख्यमंत्री नायब सैनी को पत्र लिखकर सितंबर तक धरना-प्रदर्शन और रैलियों पर लगी रोक को वापस लेने की मांग की है।

जनसभा और धरना-प्रदर्शन पर रोक हटाई जाए, अभय चौटाला ने CM नायब सैनी को लिखा पत्र

• अभय चौटाला ने CM नायब सैनी को पत्र लिखकर आदेश वापस लेने की मांग की

• सितंबर तक धरना-प्रदर्शन और रैलियों पर रोक को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताया

• महंगाई, बेरोजगारी और किसानों के मुद्दों पर जनता की आवाज दबाने का आरोप


इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभय सिंह चौटाला ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को पत्र लिखकर सरकार के उस आदेश को तत्काल प्रभाव से वापस लेने की मांग की है, जिसमें सितंबर माह तक धरना-प्रदर्शन और रैलियों के आयोजन पर रोक लगाई गई है।

अभय चौटाला ने कहा कि सरकार का यह फैसला बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना प्रभावित होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस आदेश के माध्यम से जनता की आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता आज महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं, कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रही है। ऐसे समय में सरकार को समस्याओं के समाधान पर ध्यान देना चाहिए, न कि जनता की आवाज उठाने वालों पर प्रतिबंध लगाने चाहिए।

अभय चौटाला ने अपने पत्र में कहा कि लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करना और सरकार से जवाब मांगना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। जनता सत्ता में बैठी सरकार से पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदार शासन की अपेक्षा रखती है।

उन्होंने कहा कि यदि राज्य की वित्तीय स्थिति कमजोर है तो सरकार को गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करनी चाहिए। जनता के अधिकारों को सीमित करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

इनेलो नेता ने कहा कि उनकी पार्टी ऊर्जा संरक्षण और संसाधनों की बचत के पक्ष में है, लेकिन किसी भी नीति या आदेश को संविधान, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए।

अभय चौटाला ने कहा कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है और उसकी आवाज को दबाने का कोई भी प्रयास जनभावनाओं के खिलाफ माना जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इनेलो इस प्रकार के आदेशों का पुरजोर विरोध करती है और सरकार से इसे तुरंत वापस लेने की मांग करती है।

राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विपक्षी दल सरकार के इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि सरकार की ओर से अभी तक इस पत्र पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।