Video: 40 साल बाद बोफोर्स केस का आखिरकार हुआ अंत: सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी याचिका भी खारिज की, अब हमेशा के लिए बंद हुआ विवाद
करीब 40 साल पुराने बोफोर्स मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी याचिका भी खारिज कर दी। इसके साथ ही 1986 की चर्चित तोप खरीद डील से जुड़ा विवाद कानूनी रूप से समाप्त हो गया।
➤ सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स मामले में आखिरी लंबित याचिका भी खारिज की
➤ 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपील सुनने से किया इनकार
➤ 1986 की तोप खरीद डील से शुरू हुआ विवाद करीब चार दशक बाद कानूनी रूप से खत्म
देश के सबसे चर्चित और लंबे समय तक राजनीतिक बहस का केंद्र रहे बोफोर्स घोटाले का आखिरकार कानूनी अध्याय समाप्त हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मामले से जुड़ी आखिरी लंबित याचिका भी खारिज कर दी। इसके साथ ही करीब 40 साल पुराने बोफोर्स मामले पर न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त हो गई। अदालत ने 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा हिंदुजा बंधुओं और बोफोर्स कंपनी को दी गई राहत के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई से भी इनकार कर दिया।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि अब इस मामले में आगे सुनवाई की आवश्यकता नहीं है। इस फैसले के साथ दशकों से चली आ रही कानूनी लड़ाई का अंत हो गया।
क्या था बोफोर्स घोटाला?
यह मामला 1986 में भारत सरकार और स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुई 1,437 करोड़ रुपये की 155 मिमी होवित्जर तोपों की खरीद से जुड़ा था। इस रक्षा सौदे के तहत भारत ने 400 बोफोर्स तोपें खरीदने का समझौता किया था।
इसके एक वर्ष बाद 1987 में स्वीडिश रेडियो की रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस रक्षा सौदे को हासिल करने के लिए कथित तौर पर करोड़ों रुपये का कमीशन दिया गया। इसके बाद यह मामला देश के सबसे बड़े राजनीतिक विवादों में शामिल हो गया।
कैसे कमजोर पड़ गया पूरा केस?
बोफोर्स मामला वर्षों तक जांच और अदालतों में चलता रहा, लेकिन अंततः आरोप साबित नहीं हो सके।
जांच के दौरान CBI आरोपों को अदालत में साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी। विदेशी एजेंसियों से प्राप्त कई दस्तावेजों की प्रमाणिकता पर भी सवाल उठे। अदालत ने माना कि केवल अपुष्ट दस्तावेजों के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं है।
इसके अलावा कथित कमीशन और आरोपियों के बीच प्रत्यक्ष संबंध भी अदालत में स्थापित नहीं किया जा सका। वर्षों तक चली जांच और कानूनी प्रक्रिया के कारण कई महत्वपूर्ण गवाह और परिस्थितियां भी बदल गईं, जिससे मामला और कमजोर होता गया।
केस बंद होने से पहले CBI ने की आखिरी कोशिश
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले CBI ने अमेरिकी जांचकर्ता माइकल हर्शमैन से जुड़ी जानकारी जुटाने की कोशिश भी की। एजेंसी ने अमेरिका और इंटरपोल के माध्यम से दस्तावेज हासिल करने का प्रयास किया, लेकिन कोई ठोस साक्ष्य हाथ नहीं लगा।
बाद में अदालत की अनुमति से विदेश से कानूनी सहायता भी मांगी गई, लेकिन उससे भी जांच में कोई निर्णायक प्रगति नहीं हो सकी।
CBI की जांच पर भी उठे सवाल
इस पूरे मामले में CBI की जांच को लेकर भी कई सवाल उठे।
- जांच पर करीब 250 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद एजेंसी मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी।
- सुप्रीम कोर्ट पहले भी यह टिप्पणी कर चुका था कि अपील दाखिल करने में करीब 12 साल (4522 दिन) की देरी हुई।
- दिल्ली हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले में जांच की गुणवत्ता और दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे।
राजीव गांधी सरकार पर पड़ा था बड़ा राजनीतिक असर
बोफोर्स विवाद का असर केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय राजनीति पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।
1984 के लोकसभा चुनाव में रिकॉर्ड बहुमत हासिल करने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार पर बोफोर्स सौदे में कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगे। उस समय रक्षा मंत्री रहे वी.पी. सिंह ने इस्तीफा दे दिया और बाद में यही मुद्दा 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ बड़ा चुनावी मुद्दा बना। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और बोफोर्स विवाद भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित मामलों में शामिल हो गया।
कारगिल युद्ध में साबित हुई बोफोर्स तोप की ताकत
हालांकि बोफोर्स सौदा विवादों में रहा, लेकिन 1999 के कारगिल युद्ध में यही बोफोर्स होवित्जर तोपें भारतीय सेना के लिए बेहद प्रभावी साबित हुईं। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में दुश्मन के ठिकानों पर सटीक और लगातार गोलाबारी करने की इसकी क्षमता ने भारतीय सेना को महत्वपूर्ण बढ़त दिलाई।
Akhil Mahajan