तेल पर सियासी खेल: केंद्र की ‘राहत’ और हिमाचल का ‘सेस’, जनता के लिए क्या बदलेगा?
केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी कटौती और हिमाचल सरकार के नए सेस के बीच तेल की राजनीति तेज हो गई है, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है।
■ केंद्र ने एक्साइज घटाई, हिमाचल में सेस से बढ़ा बोझ
■ तेल पर राहत बनाम टैक्स की सियासत, जनता कशमकश में
■ सामाजिक कल्याण बनाम महंगाई, दो मॉडल आमने-सामने
विशेष विश्लेषण | सिटी तहलका
तेल की राजनीति भारत में हमेशा से सत्ता की चाबी रही है। लेकिन इस समय हिमाचल प्रदेश की जनता एक अजीबोगरीब कशमकश से गुजर रही है। एक तरफ केंद्र सरकार ने वैश्विक संकट के बीच देशवासियों को 'राहत' का मरहम लगाया है, तो दूसरी तरफ हिमाचल की सुक्खू सरकार ने 'जनकल्याण' के नाम पर नया आर्थिक बोझ डाल दिया है।
वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच जहां केंद्र सरकार की मोदी सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में भारी कटौती कर राहत देने का दावा किया है, वहीं हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने नया सेस लगाने का रास्ता खोलकर आम जनता पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। इस फैसले के बाद ‘राहत बनाम राजस्व’ की बहस तेज हो गई है और आम उपभोक्ता खुद को दो नीतियों के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहा है।
मार्च 2026 के अंतिम सप्ताह में केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी को 13 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 3 रुपये प्रति लीटर कर दिया, जबकि डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर से घटाकर शून्य कर दिया गया। सरकार का तर्क है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और होर्मुज जलमार्ग पर संकट जैसी परिस्थितियों के बीच आम आदमी को राहत देना जरूरी था। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, सरकार ने राजकोषीय दबाव झेलते हुए यह कदम उठाया ताकि उपभोक्ताओं को महंगाई के झटके से बचाया जा सके।
दूसरी ओर, हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने हिमाचल प्रदेश वैट (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कर राज्य सरकार को पेट्रोल और डीजल पर ₹5 प्रति लीटर तक का अतिरिक्त सेस लगाने का अधिकार दे दिया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का कहना है कि इस सेस से मिलने वाला राजस्व ‘अनाथ और विधवा कल्याण कोष’ में जाएगा और इससे सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को मजबूती मिलेगी।
हालांकि विपक्ष ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने इसे जनविरोधी करार देते हुए आरोप लगाया कि सरकार अपनी खराब आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए जनता पर बोझ डाल रही है और संवेदनशील मुद्दों का सहारा लिया जा रहा है।
अगर दोनों फैसलों को एक साथ देखा जाए तो तस्वीर और साफ हो जाती है। एक तरफ केंद्र सरकार टैक्स घटाकर कीमतों में संभावित राहत का रास्ता बना रही है, वहीं राज्य स्तर पर टैक्स बढ़ोतरी उस राहत को कम कर सकती है। दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में जहां कीमतों में गिरावट की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं हिमाचल में पेट्रोल-डीजल की कीमतें ₹100 के करीब पहुंचने का अंदेशा बना हुआ है।
असल में यह पूरा मामला सिर्फ टैक्स या कीमतों का नहीं, बल्कि सियासी नैरेटिव का भी है। केंद्र इसे महंगाई से राहत का कदम बता रहा है, जबकि राज्य इसे सामाजिक कल्याण के लिए जरूरी राजस्व जुटाने का माध्यम बता रहा है। लेकिन इन दोनों के बीच सबसे ज्यादा असर आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है, जो हर रोज बढ़ती लागत और अनिश्चितता का सामना कर रहा है।
केंद्र का मास्टरस्ट्रोक: ₹10 तक की भारी कटौती
मार्च 2026 के अंतिम सप्ताह में केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी ₹13 से घटाकर ₹3 और डीजल पर ₹10 से घटाकर शून्य (Nil) कर दी है।
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प्रभाव: इस कदम से तेल कंपनियों का घाटा कम हुआ और खुदरा कीमतों में बड़ी गिरावट का रास्ता साफ हुआ।
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तर्क: पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी के अनुसार, "मोदी सरकार ने राजकोष पर बोझ सहना चुना ताकि आम आदमी को वैश्विक अस्थिरता से बचाया जा सके।"
हिमाचल का 'विंडो और ऑर्फन सेस': राहत पर आफत?
वहीं, हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने हाल ही में हिमाचल प्रदेश वैट (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया है। इसके तहत राज्य सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर ₹5 प्रति लीटर तक का सेस लगाने का अधिकार सुरक्षित कर लिया है।
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उद्देश्य: मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का कहना है कि यह पैसा 'अनाथ और विधवा कल्याण कोष' में जाएगा।
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विरोध: विपक्ष (BJP) इसे 'जनविरोधी' करार दे रहा है। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर का आरोप है कि सरकार अपनी फिजूलखर्ची और खस्ताहाल आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए अनाथों के नाम का सहारा लेकर जनता की जेब काट रही है।
तुलनात्मक चश्मा: दिल्ली बनाम हिमाचल
Akhil Mahajan