कारगिल हीरो दीपचंद को प्रेमानंद महाराज ने किया सैल्यूट सैनिक ही असली संत होते हैं

हिसार के कारगिल हीरो दीपचंद ने वृंदावन में प्रेमानंद महाराज से मुलाकात की। महाराज ने उन्हें सैल्यूट कर सैनिकों को असली संत बताया। दीपचंद कारगिल युद्ध में अपने दोनों पैर और एक हाथ गंवा चुके हैं।

कारगिल हीरो दीपचंद को प्रेमानंद महाराज ने किया सैल्यूट सैनिक ही असली संत होते हैं

■ कारगिल हीरो दीपचंद को प्रेमानंद महाराज ने किया सैल्यूट
■ बोले – आप जैसे सैनिक ही असली संत, आपके दर्शन से सुख मिला
■ कारगिल युद्ध के बाद ब्लास्ट में गंवाए दोनों पैर और एक हाथ


हरियाणा के हिसार जिले के गांव पाबड़ा निवासी कारगिल हीरो और पूर्व सैनिक लांस नायक दीपचंद ने वृंदावन पहुंचकर संत प्रेमानंद महाराज से मुलाकात की। इस दौरान प्रेमानंद महाराज ने दीपचंद को देखते ही उन्हें सैल्यूट किया और कहा कि आप जैसे वीर सैनिकों की वजह से ही आज देश सुरक्षित है। उन्होंने दीपचंद को सही मायने में सबसे बड़ा संत बताया और कहा कि आपके दर्शन करके मुझे अंदर से सुख और आनंद की अनुभूति हुई है।तिरंगे की पट्‌टी को अपने माथे पर लगाते प्रेमानंद जी महाराज।

मुलाकात के दौरान दीपचंद ने कारगिल युद्ध के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उनकी बटालियन ने युद्ध के दौरान दुश्मनों पर करीब 10 हजार गोले दागे थे, जो एक रिकॉर्ड है। उन्होंने बताया कि युद्ध के समय उन्होंने अपने अफसरों से कहा था कि राशन मिले या न मिले, लेकिन गोला-बारूद जरूर मिलना चाहिए। उनकी बटालियन ने दुश्मनों के कई बंकर तबाह किए और तोलोलिंग जैसे कठिन क्षेत्र पर कब्जा करने में अहम भूमिका निभाई।

दीपचंद ने प्रेमानंद महाराज को बताया कि कारगिल युद्ध के बाद एक ब्लास्ट में उनके दोनों पैर और एक हाथ बुरी तरह जख्मी हो गए थे। डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए दोनों पैर और एक हाथ काटना पड़ा। उस समय उन्हें बचाने के लिए 17 बोतल खून चढ़ाया गया था। आज उनके दोनों पैर घुटनों तक नकली हैं, लेकिन इसके बावजूद वह आज भी एक सैनिक की तरह खड़े होकर सैल्यूट करते हैं।कारगिल नायक दीपचंद के घुटने तक दोनों पैर नकली हैं।

दीपचंद ने बताया कि वह आज भी हर शहीद सैनिक के घर जाते हैं और अपने हाथ से एक दीपक भेंट करते हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी गाड़ी भी मॉडिफाई करवाई हुई है, ताकि वह खुद गाड़ी चलाकर शहीद परिवारों तक पहुंच सकें। यह सुनकर प्रेमानंद महाराज भी भावुक हो गए और कहा कि जो सैनिक देश के लिए सब कुछ न्यौछावर कर देता है, वह किसी संत से कम नहीं होता।

दीपचंद 1989 में सेना में भर्ती हुए थे और कई खतरनाक ऑपरेशन का हिस्सा रहे। कारगिल युद्ध में उनकी बटालियन को 12 गैलेंटरी अवॉर्ड मिले थे। आज भी दीपचंद का जीवन देशभक्ति, सेवा और त्याग की मिसाल बना हुआ है।