चंबा में अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले का भव्य आगाज, राज्यपाल ने किया शुभारंभ

चंबा में अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला-2026 का राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने शुभारंभ किया। 2 अगस्त तक चलने वाले मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं और धार्मिक आयोजन होंगे।

चंबा में अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले का भव्य आगाज, राज्यपाल ने किया शुभारंभ
  • चंबा में अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला-2026 का राज्यपाल ने किया भव्य शुभारंभ
  • 2 अगस्त तक सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं और प्रदर्शनी का होगा आयोजन
  • मिंजर मेला अच्छी फसल, समृद्धि और सामाजिक भाईचारे का प्रतीक माना जाता है

हिमाचल प्रदेश के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला-2026 का रविवार को चंबा में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भव्य शुभारंभ हुआ। राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने पारंपरिक शोभायात्रा में भाग लेकर भगवान लक्ष्मीनारायण और भगवान रघुनाथ मंदिर में मिंजर अर्पित की तथा प्रदेश की सुख-समृद्धि, शांति और अच्छी फसल की कामना की।

मंदिरों में पूजा-अर्चना के बाद राज्यपाल ने ऐतिहासिक चौगान मैदान में ध्वजारोहण कर आठ दिवसीय मेले का औपचारिक उद्घाटन किया। यह मेला 26 जुलाई से 2 अगस्त तक चलेगा, जिसमें प्रदेश ही नहीं बल्कि देश-विदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के पहुंचने की उम्मीद है।

शोभायात्रा में दिखी चंबा की सांस्कृतिक विरासत

मेले के शुभारंभ से पहले नगर परिषद कार्यालय परिसर से पारंपरिक शोभायात्रा निकाली गई। ढोल-नगाड़ों, बैंड-बाजों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच निकली इस शोभायात्रा में चंबा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था की झलक देखने को मिली।

शोभायात्रा में एसडीएम चिराग शर्मा, नगर परिषद अध्यक्ष भुवनेश्वरी गुलाटी, उपाध्यक्ष जितेंद्र सूर्य, कार्यकारी अधिकारी राखी कौशल, सभी पार्षद, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए।

2 अगस्त तक होंगे विविध आयोजन

जिला प्रशासन के अनुसार मेले के दौरान सांस्कृतिक संध्याएं, लोकनृत्य, लोकसंगीत, खेलकूद प्रतियोगिताएं, हस्तशिल्प प्रदर्शनी और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ अन्य राज्यों के कलाकार भी अपनी प्रस्तुतियां देंगे।

क्या है मिंजर मेले का इतिहास?

मिंजर मेला हिमाचल प्रदेश की सबसे पुरानी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में से एक माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार इसकी शुरुआत चंबा रियासत के समय किसी महत्वपूर्ण विजय और अच्छी फसल की खुशी में हुई थी। उस समय लोगों ने राजा का स्वागत धान और मक्की की बालियों के प्रतीक 'मिंजर' से किया था। समय के साथ यह परंपरा अंतरराष्ट्रीय स्तर के मेले में बदल गई।

मिंजर का धार्मिक महत्व

मिंजर रेशमी धागों से तैयार की जाने वाली विशेष लटकन होती है, जो धान और मक्की की नई बालियों का प्रतीक मानी जाती है। इसे खुशहाली, समृद्धि और अच्छी फसल का शुभ प्रतीक माना जाता है। मेले के दौरान श्रद्धालु इसे अपने वस्त्रों पर धारण करते हैं और मंदिरों में अर्पित करते हैं।

रावी नदी में होती है मिंजर की विदाई

मेले का समापन विशेष धार्मिक अनुष्ठान के साथ होता है। अंतिम दिन पारंपरिक शोभायात्रा रावी नदी के तट तक पहुंचती है, जहां मिंजर, नारियल, मौसमी फल और अन्य शुभ सामग्री नदी में अर्पित की जाती है। यह परंपरा प्रकृति के प्रति आभार और अच्छी फसल की कामना का प्रतीक मानी जाती है।

भाईचारे और संस्कृति का उत्सव

अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि चंबा की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक समरसता और भाईचारे का भी प्रतीक है। वर्षों से विभिन्न समुदायों के लोग मिलकर इस आयोजन को सफल बनाते आ रहे हैं। यही कारण है कि यह मेला आज अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है।