लॉकडाउन में जन्मे बच्चों में बढ़ रहीं फोकस और व्यवहार संबंधी समस्याएं, विशेषज्ञों ने माता-पिता को किया अलर्ट

एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि कोविड लॉकडाउन के दौरान जन्मे बच्चों में ध्यान केंद्रित करने, भावनाओं को नियंत्रित करने और व्यवहारिक विकास से जुड़ी समस्याएं अधिक देखी जा रही हैं।

लॉकडाउन में जन्मे बच्चों में बढ़ रहीं फोकस और व्यवहार संबंधी समस्याएं, विशेषज्ञों ने माता-पिता को किया अलर्ट

लॉकडाउन के दौरान जन्मे बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की समस्या देखी गई
भावनाओं को नियंत्रित करने और निर्देश मानने में भी हो रही कठिनाई
विशेषज्ञ बोले- ऐसे बच्चों को अतिरिक्त सहयोग और सामाजिक माहौल की जरूरत

हेल्थ डेस्क। कोरोना महामारी भले ही अब बीते समय की बात लगती हो, लेकिन इसके प्रभाव आज भी कई रूपों में सामने आ रहे हैं। एक हालिया अध्ययन में चिंता जताई गई है कि कोविड लॉकडाउन के दौरान जन्मे बच्चों में मानसिक और व्यवहारिक विकास से जुड़ी कुछ चुनौतियां देखने को मिल रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि जिन बच्चों का जन्म 2020 के पहले लॉकडाउन के दौरान हुआ, उनमें अब चार से पांच वर्ष की उम्र तक पहुंचने पर ध्यान लगाने, भावनाओं को नियंत्रित करने, निर्देशों का पालन करने और किसी कार्य को पूरा करने में अधिक कठिनाई देखी जा रही है।

शुरुआती सामाजिक माहौल नहीं मिल पाया

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके मस्तिष्क विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान माता-पिता के अलावा दादा-दादी, रिश्तेदार, पड़ोसी, अन्य बच्चे और स्कूल का वातावरण भी उसके सामाजिक और भावनात्मक विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।

लेकिन लॉकडाउन के दौरान पैदा हुए कई बच्चों का शुरुआती बचपन घर की चार दीवारों तक सीमित रहा। उन्हें सामान्य सामाजिक संपर्क, खेलकूद और बाहरी अनुभव काफी देर से मिले।

इंग्लैंड में हुआ बड़ा अध्ययन

यह अध्ययन इंग्लैंड की सिटी सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया। इसमें 23 मार्च से 23 जून 2020 के बीच जन्मे 205 बच्चों का अध्ययन किया गया।

शोध में पाया गया कि इन बच्चों में एक्जीक्यूटिव फंक्शन का स्तर सामान्य बच्चों की तुलना में कम पाया गया।

क्या होता है एक्जीक्यूटिव फंक्शन?

यह मस्तिष्क की वह क्षमता है, जो बच्चों को:

  • योजनाएं बनाने,
  • समस्याओं का समाधान करने,
  • नई परिस्थितियों में खुद को ढालने,
  • ध्यान केंद्रित रखने,
  • सही निर्णय लेने,
  • भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद करती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस क्षेत्र में कमजोरी बनी रहती है तो इसका असर बच्चों की पढ़ाई, सामाजिक व्यवहार और आत्मविश्वास पर लंबे समय तक पड़ सकता है।

हर तीन में से एक बच्चे में दिखीं दिक्कतें

अध्ययन के दौरान बच्चों की भाषा क्षमता, सोचने-समझने की शक्ति और व्यवहारिक विकास का आकलन किया गया।

शोध में शामिल लगभग हर तीन में से एक बच्चे में एक्जीक्यूटिव फंक्शन से जुड़ी कठिनाइयां सामने आईं।

इसके अलावा कई बच्चों में:

  • विचारों को शब्दों में व्यक्त करने में कमजोरी,
  • भावनाओं को नियंत्रित करने में परेशानी,
  • किसी काम को व्यवस्थित ढंग से पूरा करने में कठिनाई,
  • बिना सहायता समस्या सुलझाने में कमजोरी भी देखी गई।

माता-पिता क्या करें?

विशेषज्ञों का कहना है कि घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन माता-पिता को बच्चों के व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए।

इन बातों का रखें विशेष ध्यान:

  • बच्चों को अधिक से अधिक सामाजिक गतिविधियों में शामिल करें।
  • स्क्रीन टाइम सीमित रखें।
  • बच्चों के साथ नियमित बातचीत करें।
  • कहानी सुनाना, चित्र बनाना और समूह खेल खेलने के अवसर दें।
  • यदि बच्चा अत्यधिक चिड़चिड़ा, भावनात्मक रूप से असंतुलित या ध्यान लगाने में लगातार कमजोर दिखे तो बाल विशेषज्ञ या मनोवैज्ञानिक से सलाह लें।

विशेषज्ञों का मानना है कि सही वातावरण, सहयोग और समय पर सहायता मिलने पर अधिकांश बच्चे बेहतर तरीके से विकास कर सकते हैं।