प्रेग्नेंसी के बाद संघर्ष, पति बने कोच और बेटे ने बढ़ाया हौसला... हरियाणा की सीमा ने कॉमनवेल्थ में रचा इतिहास, PHD स्कॉलर ने जीता ब्रॉन्ज
हरियाणा के भिवानी की पीएचडी स्कॉलर सीमा कालीरमन ने ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में डिस्कस थ्रो में ब्रॉन्ज मेडल जीता। प्रेग्नेंसी के बाद शानदार वापसी कर उन्होंने देश का गौरव बढ़ाया।
➤ भिवानी की सीमा कालीरमन ने ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में डिस्कस थ्रो में ब्रॉन्ज मेडल जीता
➤ प्रेग्नेंसी के कारण दो सीजन ग्राउंड से बाहर रहीं, पति की कोचिंग में किया शानदार कमबैक
➤ चार साल के बेटे रुद्र को बताया सबसे बड़ा मोटिवेटर, भारत के पदकों की संख्या पहुंची 17
हरियाणा के भिवानी जिले के दिनोद गांव की रहने वाली सीमा कालीरमन ने ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए डिस्कस थ्रो स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश और प्रदेश का नाम रोशन किया है। स्कॉटस्टाउन स्टेडियम में गुरुवार देर रात खेले गए फाइनल मुकाबले में सीमा ने अपने तीसरे प्रयास में 58.65 मीटर का थ्रो करते हुए तीसरा स्थान हासिल किया। इस उपलब्धि के साथ भारत के कुल पदकों की संख्या 17 हो गई है, जिनमें 3 गोल्ड, 10 सिल्वर और 4 ब्रॉन्ज शामिल हैं। इस प्रदर्शन के बाद भारत पदक तालिका में 10वें स्थान पर पहुंच गया है।
चार साल के बेटे रुद्र ने दिया सबसे बड़ा हौसला
कॉमनवेल्थ में पदक जीतने के बाद सीमा ने अपनी सफलता का सबसे बड़ा श्रेय अपने चार साल के बेटे रुद्र को दिया। उन्होंने बताया कि जब ट्रेनिंग के दौरान वह अच्छा थ्रो करती हैं तो उनके कोच केवल "ठीक है" कहते हैं, लेकिन बेटा पूरे उत्साह से "हां मम्मी, वेरी गुड, आपने बहुत अच्छा किया" कहकर उनका मनोबल बढ़ाता है। सीमा का कहना है कि बेटे की यही मासूम बातें उन्हें हर दिन बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करती हैं।
प्रेग्नेंसी के कारण दो सीजन बाहर रहीं, फिर भी नहीं छोड़ा सपना
सीमा कालीरमन के लिए यह सफलता आसान नहीं रही। प्रेग्नेंसी के कारण उन्हें लगातार दो सीजन तक मैदान से दूर रहना पड़ा। वर्ष 2022 में बेटे रुद्र के जन्म के बाद उन्होंने खेल में वापसी की तैयारी शुरू की। बेटे के जन्म के केवल 11 महीने बाद उन्होंने दोबारा प्रतिस्पर्धी ट्रेनिंग शुरू कर दी। वापसी के दौरान अपनी पुरानी फिटनेस, ताकत और तकनीक हासिल करने के लिए उन्हें लंबे समय तक कड़ी मेहनत करनी पड़ी।
पति रविंदर ने निभाई कोच की जिम्मेदारी
सीमा की सफलता के पीछे उनके पति रविंदर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। रविंदर स्वयं नेशनल लेवल के डिस्कस थ्रो खिलाड़ी रह चुके हैं, लेकिन चोट के कारण उनका खेल करियर आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी को अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बनाने का लक्ष्य बनाया और खुद उनके कोच बन गए।
कोरोना महामारी के दौरान भी रविंदर की सलाह पर ही सीमा ने स्पोर्ट्स साइंस में पीएचडी शुरू की। लगातार ट्रेनिंग, तकनीकी सुधार और मानसिक मजबूती पर काम करते हुए उन्होंने सीमा को दोबारा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
भिवानी की PHD स्कॉलर हैं सीमा
27 वर्षीय सीमा कालीरमन केवल खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि चौधरी बंसी लाल यूनिवर्सिटी, भिवानी से फिजिकल एजुकेशन विषय में पीएचडी भी कर रही हैं। पढ़ाई, खेल और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाकर उन्होंने यह उपलब्धि हासिल की है।
तीसरे प्रयास में मिला ब्रॉन्ज, चार थ्रो रहे फाउल
डिस्कस थ्रो के फाइनल में सीमा के सामने कड़ी चुनौती थी। उन्हें कुल 6 प्रयास मिले, जिनमें से 4 थ्रो फाउल रहे। दूसरे प्रयास में उन्होंने 57.32 मीटर का थ्रो किया, जिससे वह तीसरे स्थान पर पहुंचीं।
इसके बाद तीसरे प्रयास में उन्होंने 58.65 मीटर का शानदार थ्रो किया। यही दूरी अंत तक बरकरार रही और उन्हें ब्रॉन्ज मेडल दिलाने में निर्णायक साबित हुई। बाद के तीनों प्रयास फाउल रहे, लेकिन कोई भी खिलाड़ी उनके सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को पीछे नहीं छोड़ सका।
नेशनल इंटर-स्टेट मीट से बनाई थी मजबूत दावेदारी
कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले भुवनेश्वर में आयोजित नेशनल इंटर-स्टेट मीट में सीमा ने 59.73 मीटर का अपना सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए गोल्ड मेडल जीता था। इसी प्रदर्शन के आधार पर उन्होंने 2026 एशियन गेम्स के लिए क्वालिफाई किया और कॉमनवेल्थ गेम्स की भारतीय टीम में जगह बनाई।
इससे पहले वह 2025 एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में चौथे स्थान पर रही थीं, जबकि 2025 साउथ एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल जीतकर अपनी क्षमता का परिचय दिया था।
'वापसी आसान नहीं थी', सीमा ने बताया संघर्ष
कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले सीमा ने कहा था कि मां बनने के बाद मैदान पर वापसी करना उनके लिए बेहद कठिन था। शुरुआत में वह ठीक से डिस्कस भी नहीं फेंक पा रही थीं। लेकिन पति की लगातार मेंटोरिंग, मोटिवेशन और मेहनत की बदौलत उन्होंने न केवल अपनी पुरानी ताकत वापस हासिल की, बल्कि उसमें और सुधार करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश के लिए पदक भी जीत लिया।
Akhil Mahajan