4600 कर्मचारियों का भविष्य आज तय, सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फैसला

हरियाणा के 4600 ग्रुप C और D कर्मचारियों को पक्का करने की नीति पर सुप्रीम कोर्ट आज फैसला सुनाएगा, जिससे हजारों कर्मचारियों के भविष्य पर असर पड़ेगा।

4600 कर्मचारियों का भविष्य आज तय, सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फैसला

4600 कर्मचारियों के भविष्य पर आज सुप्रीम कोर्ट का फैसला
ग्रुप C-D कर्मियों को पक्का करने की नीति पर 7 साल से विवाद
हाईकोर्ट ने 2018 में पॉलिसी रद्द की, अब अंतिम फैसला SC से


हरियाणा के करीब 4600 ग्रुप C और ग्रुप D कर्मचारियों के भविष्य का फैसला आज तय होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से लंबित इस मामले पर आज निर्णय सुनाया जाएगा, जिसका सीधा असर हजारों कर्मचारियों की नौकरी और सेवा शर्तों पर पड़ेगा।

यह विवाद साल 2014 में शुरू हुआ था, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार ने लोकसभा चुनाव में हार के बाद एक विशेष नीति बनाकर विभिन्न विभागों में कार्यरत अस्थायी कर्मचारियों को नियमित (पक्का) करने का फैसला लिया था। इस नीति के तहत करीब 4600 कर्मचारियों को स्थायी कर दिया गया था।

हालांकि, इस निर्णय का कई स्तरों पर विरोध हुआ। आरोप लगाए गए कि नियमितीकरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और तय नियमों का पालन नहीं किया गया और पात्रता मानकों को नजरअंदाज किया गया। इसके खिलाफ पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं।

साल 2018 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई के बाद इस नीति को पूरी तरह से निरस्त कर दिया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि सरकारी नौकरियों में नियुक्ति और नियमितीकरण संविधान और निर्धारित नियमों के तहत ही होना चाहिए, किसी विशेष नीति के आधार पर नहीं।

इसके बाद प्रभावित कर्मचारियों और अन्य पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पिछले करीब सात वर्षों से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहा और 4 नवंबर 2025 को सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो अब आज सुनाया जा रहा है।

इस फैसले पर कर्मचारियों के साथ-साथ राज्य सरकार की भी नजर टिकी हुई है। यदि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है, तो हजारों कर्मचारियों की नौकरी और भविष्य पर संकट गहरा सकता है। वहीं यदि कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले को पलट देता है, तो इन कर्मचारियों की नौकरी को कानूनी मान्यता मिल जाएगी।

यह फैसला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे भविष्य में सरकारी भर्ती और नियमितीकरण की नीतियों को लेकर स्पष्ट दिशा मिलेगी। साथ ही यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता और संवैधानिक प्रक्रियाओं के पालन को लेकर भी एक बड़ा उदाहरण साबित हो सकता है।