जब 'नंदिनी' गई... घर की बेटी की तरह दी अंतिम विदाई, हर आंख हुई नम
सोनीपत के तिहाड़ा परिवार ने 18 साल तक साथ रही 'नंदिनी' गाय को बेटी की तरह वैदिक रीति-रिवाजों से अंतिम विदाई दी। उसकी स्मृति में हवन और गौ-भोज का आयोजन भी किया जाएगा।
➤ 18 साल तक परिवार का हिस्सा रही नंदिनी को वैदिक रीति-रिवाजों से दी गई अंतिम विदाई
➤ परिवार बोला- उसने दूध नहीं, ममता और संस्कार दिए, इसलिए बेटी की तरह किया सम्मान
➤ हवन, गौ-भोज और श्रद्धांजलि सभा का होगा आयोजन, गांव के लोगों ने भी दी भावभीनी विदाई
हरियाणा के सोनीपत जिले के हसनयारपुर तिहाड़ा कलां गांव में मंगलवार को एक ऐसी विदाई हुई, जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं। करीब 18 वर्षों तक परिवार के साथ रहने वाली 'नंदिनी' के निधन पर उसे एक पशु नहीं, बल्कि घर की बेटी और परिवार के सदस्य की तरह अंतिम विदाई दी गई। पूरे परिवार ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पुष्प अर्पित किए और धार्मिक परंपराओं के अनुसार सम्मानपूर्वक समाधि दी।
परिजनों का कहना है कि नंदिनी ने वर्षों तक दूध, घी और छाछ देकर केवल घर का पालन-पोषण ही नहीं किया, बल्कि परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गई थी। इसलिए उसकी विदाई भी उसी सम्मान और श्रद्धा के साथ करना उनका कर्तव्य था। अंतिम दर्शन के लिए गांव के लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचे।
तीन महीने की बछड़ी बनकर आई, फिर घर की बेटी बन गई
परिवार के सदस्य मनजीत तिहाड़ा ने बताया कि करीब 18 वर्ष पहले उनके भाई मेहरबान गांव महलाना से नंदिनी की मां को घर लेकर आए थे। उस समय नंदिनी महज तीन महीने की बछड़ी थी। समय के साथ वह पूरे परिवार में इस तरह घुल-मिल गई कि सभी उसे अपनी बेटी की तरह मानने लगे।
करीब 16 वर्ष पहले प्रसव के दौरान उसकी मां की मौत हो गई। उस समय नंदिनी केवल दो साल की थी। मां के जाने के बाद पूरे परिवार ने उसकी देखभाल की जिम्मेदारी उठाई और उसे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया।
घर में बेटी नहीं थी, इसलिए रिश्ता और गहरा हो गया
मनजीत तिहाड़ा बताते हैं कि उस समय परिवार में कोई बेटी नहीं थी। यही वजह रही कि नंदिनी के साथ परिवार का भावनात्मक रिश्ता और गहरा होता चला गया। बाद में घर में बेटी का जन्म हुआ, लेकिन तब तक नंदिनी हर सदस्य के दिल में अपनी अलग जगह बना चुकी थी।
परिवार के बच्चे उसके साथ खेलते हुए बड़े हुए। परिजनों का कहना है कि अपने पूरे जीवन में नंदिनी ने कभी किसी बच्चे, बुजुर्ग या अन्य व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया।
12 संतानों को जन्म देकर बढ़ाया परिवार
नंदिनी ने अपने जीवनकाल में 12 संतानों को जन्म दिया। इनमें से छह गाय आज भी तिहाड़ा परिवार के पास हैं, जबकि अन्य बछड़े और बछड़ियां परिचितों और मित्रों को दे दिए गए। परिवार आज भी उसी समर्पण के साथ पूरे गौवंश की सेवा कर रहा है।
परिजनों का कहना है कि नंदिनी ने केवल गौवंश ही नहीं बढ़ाया, बल्कि वर्षों तक पूरे परिवार के जीवन का आधार भी बनी रही।
आखिरी बछड़ी के जाने के एक सप्ताह बाद खुद भी चल बसी
करीब एक वर्ष पहले नंदिनी ने समय से पहले एक बछड़ी को जन्म दिया था। कमजोर होने के कारण वह अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकी और करीब एक सप्ताह पहले उसकी मौत हो गई। परिवार अभी उस दुख से उबर भी नहीं पाया था कि ठीक एक सप्ताह बाद बीमारी के चलते नंदिनी ने भी अंतिम सांस ले ली।
परिवार के अनुसार पिछले साढ़े तीन महीने से उसका इलाज चल रहा था। कई पशु चिकित्सकों से सलाह ली गई। चिकित्सकों ने आशंका जताई कि संभव है उसने लोहे का कोई टुकड़ा निगल लिया हो, जिससे उसकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई।
वैदिक रीति से अंतिम संस्कार, अब होगा हवन और गौ-भोज
आषाढ़ मास की सप्तमी पर नंदिनी के पार्थिव शरीर पर पहले गुलाब की पंखुड़ियों से पुष्प वर्षा की गई। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अंतिम संस्कार किया गया। समाधि देते समय 31 किलोग्राम नमक डालकर धार्मिक परंपरा के अनुसार मिट्टी दी गई।
परिवार ने घोषणा की है कि नंदिनी की स्मृति में हवन, गौ-भोज और श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। उनका कहना है कि गौ माता को सम्मानपूर्वक विदाई देना केवल परंपरा नहीं, बल्कि उनके संस्कारों का हिस्सा है।
पीढ़ियों से निभा रहा है गौ सेवा का संकल्प
मनजीत तिहाड़ा ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय जय भगवान पूरे क्षेत्र में गौ सेवा और गौ रक्षा के लिए समर्पित रहे। लोग उन्हें प्यार से 'गोरख' कहकर बुलाते थे। वहीं उनके दादा गुरु चंद्र दास ने परिवार को जीव रक्षा और सनातन धर्म के संस्कार दिए थे।
परिवार का कहना है कि वही संस्कार आज भी उनकी सबसे बड़ी पूंजी हैं और आने वाली पीढ़ियां भी गौ सेवा और जीव रक्षा की इस परंपरा को आगे बढ़ाती रहेंगी।
Akhil Mahajan