हुड्डा का 'ऑपरेशन हिमाचल' लाया रंग! आखिर हिमाचल की बर्फीली वादियों में लिखी गई करमवीर सिंह बौद्ध की जीत की पटकथा हुई कामयाब

हरियाणा राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार करमवीर सिंह बौद्ध की जीत के पीछे भूपेंद्र सिंह हुड्डा के 'ऑपरेशन हिमाचल' की पूरी कहानी। जानें कैसे विधायकों की बाड़ेबंदी और कड़ी निगरानी ने बीजेपी की रणनीति को फेल कर दिया।

हुड्डा का 'ऑपरेशन हिमाचल' लाया रंग!  आखिर हिमाचल की बर्फीली वादियों में लिखी गई करमवीर सिंह बौद्ध की जीत की पटकथा हुई कामयाब

राज्यसभा चुनाव में हुड्डा का 'ऑपरेशन हिमाचल' सफल

■ विधायकों की बाड़ेबंदी और जैमर वाली अभेद्य घेराबंदी

■ करमवीर सिंह बौद्ध की जीत के पीछे की इनसाइड स्टोरी


हरियाणा की सियासत में राज्यसभा चुनाव का परिणाम महज एक जीत नहीं, बल्कि विपक्ष के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा की रणनीतिक बिसात का वो मास्टरस्ट्रोक था, जिसने विरोधियों के चक्रव्यूह को ध्वस्त कर दिया। कांग्रेस उम्मीदवार करमवीर सिंह बौद्ध की जीत की पटकथा चंडीगढ़ में नहीं, बल्कि हिमाचल की बर्फीली वादियों में लिखी गई थी। साल 2022 में अजय माकन की हार से सबक लेते हुए हुड्डा ने इस बार 'ऑपरेशन हिमाचल' के तहत अपने विधायकों की ऐसी घेराबंदी की कि सेंधमारी की हर गुंजाइश खत्म हो गई। योजना की शुरुआत 10 से 15 मार्च के बीच विधानसभा सत्र स्थगित होने के साथ ही हो गई थी। हुड्डा ने अपने सबसे भरोसेमंद सिपाही आफताब अहमद और बीबी बत्रा को कमान सौंपी और विधायकों को प्रलोभन से दूर रखने के लिए सीधे हिमाचल प्रदेश रवाना कर दिया।

इस पूरे ऑपरेशन को इतना गोपनीय रखा गया कि विधायकों तक को उनके गंतव्य का पता नहीं था। जब काफिला हिमाचल की सीमा में दाखिल हुआ, तो सुरक्षा और गोपनीयता के लिए सिग्नल जैमर से लैस गाड़ियां साथ हो लीं, ताकि बाहरी संपर्क पूरी तरह कट जाए। हुड्डा ने अपने बेटे दीपेंद्र हुड्डा को विधायकों के साथ रहने की जिम्मेदारी दी, जबकि वरुण चौधरी और जय प्रकाश जैसे दिग्गज नेता निगरानी दल का हिस्सा थे। कुफरी के होटलों में विधायकों को बाकायदा वोट डालने की ट्रेनिंग दी गई। जब मौसम बिगड़ा, तो तुरंत रणनीति बदलते हुए सबको कसौली शिफ्ट किया गया। वोटिंग के दिन सुबह हुड्डा ने खुद मोर्चा संभाला; वे चंदर मोहन और मोहम्मद इलियास जैसे विधायकों को अपनी गाड़ी में बिठाकर विधानसभा तक लाए और वोट डालने से पहले सबके फोन जमा करा लिए। यह हुड्डा के राजनीतिक अनुभव का ही नतीजा था कि हर एक बैलेट पेपर पर उनकी पैनी नजर रही और अंततः कांग्रेस ने अपनी साख बचाते हुए करमवीर सिंह बौद्ध को राज्यसभा की दहलीज पार करवा दी।