जब भगवान राम ने गिलहरी को लगाया गले....
रामायण की प्रेरणादायक कहानी, जिसमें भगवान राम ने गिलहरी की छोटी सेवा को सबसे बड़ा सम्मान दिया और दुनिया को समर्पण व भक्ति का संदेश दिया।
➤ छोटी मदद भी बन सकती है सबसे बड़ी सेवा
➤ भगवान राम ने सिखाया हर व्यक्ति का महत्व
➤ गिलहरी की पीठ पर ऐसे बने तीन पवित्र निशान
लंका पर चढ़ाई से पहले समुद्र के किनारे वानर सेना दिन-रात रामसेतु बनाने में जुटी हुई थी। कोई बड़े-बड़े पत्थर उठा रहा था तो कोई पहाड़ तोड़कर ला रहा था। चारों तरफ “जय श्री राम” के जयकारे गूंज रहे थे। हर कोई चाहता था कि वह प्रभु श्रीराम की सेवा में अपना योगदान दे सके।
इसी बीच वहां एक छोटी सी गिलहरी भी पहुंची। उसने देखा कि विशालकाय वानर भारी पत्थर उठाकर समुद्र में डाल रहे हैं। गिलहरी सोचने लगी कि वह इतनी छोटी है, वह क्या कर सकती है। लेकिन उसके मन में प्रभु राम के प्रति अटूट प्रेम था। उसने हार नहीं मानी।
गिलहरी समुद्र किनारे जाती, अपने छोटे से शरीर को पानी में भिगोती और फिर रेत में लोटकर अपने शरीर पर रेत चिपका लेती। इसके बाद वह रामसेतु के पास जाकर उस रेत को झाड़ देती। वह बार-बार यही काम कर रही थी।
कुछ वानरों ने उसे देखकर मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा कि इतने बड़े काम में उसकी छोटी सी रेत का क्या महत्व। लेकिन गिलहरी बिना रुके अपनी सेवा करती रही। तभी भगवान राम की नजर उस छोटी गिलहरी पर पड़ी।
प्रभु श्रीराम उसके पास पहुंचे और बड़े प्रेम से उसे अपनी हथेली में उठा लिया। उन्होंने कहा कि “सेवा कभी छोटी या बड़ी नहीं होती, भावना सबसे बड़ी होती है।” भगवान राम गिलहरी की भक्ति और समर्पण से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने प्यार से उसकी पीठ पर अपनी उंगलियां फेर दीं।
मान्यता है कि तभी से गिलहरी की पीठ पर तीन सफेद धारियां बन गईं, जो आज भी भगवान राम के आशीर्वाद की निशानी मानी जाती हैं।
यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में कोई भी इंसान छोटा नहीं होता। अगर मन में सच्ची श्रद्धा और सेवा का भाव हो, तो सबसे छोटी कोशिश भी भगवान तक पहुंच जाती है। यही कारण है कि करोड़ों लोग आज भी भगवान राम को केवल भगवान नहीं, बल्कि आदर्श जीवन का सबसे बड़ा प्रतीक मानते हैं।
Akhil Mahajan