हिमाचल HC का बड़ा फैसला, बागी विधायकों की पेंशन बहाल
हिमाचल हाईकोर्ट ने कांग्रेस से बागी होकर भाजपा में शामिल पूर्व विधायकों की पेंशन बहाल करने के आदेश दिए हैं। एक माह में भुगतान नहीं होने पर 6% ब्याज देना होगा।
■ हाईकोर्ट से बागी पूर्व विधायकों को बड़ी राहत
■ पेंशन बहाल करने के एक माह में आदेश
■ देरी होने पर 6% ब्याज भी देना होगा
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस से बागी होकर भाजपा में शामिल हुए पूर्व विधायकों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्पष्ट आदेश देते हुए कहा है कि अयोग्य घोषित किए गए इन पूर्व विधायकों को विधानसभा से मिलने वाली पेंशन बहाल की जाए और उनकी बकाया राशि भी निर्धारित समय सीमा के भीतर जारी की जाए।
अदालत ने राज्य सरकार और विधानसभा सचिवालय को निर्देश दिए हैं कि पात्र याचिकाकर्ताओं की नियमित और बकाया पेंशन एक महीने के भीतर जारी की जाए। साथ ही, यदि तय समय में भुगतान नहीं होता है, तो सरकार को बकाया राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। यह आदेश जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सुनाया।
यह फैसला पूर्व विधायक राजेंद्र राणा और रवि ठाकुर द्वारा दायर अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया। दोनों ने अपनी पेंशन बहाल करने की मांग की थी, जो अयोग्यता के बाद से रोकी गई थी।
दरअसल, फरवरी 2024 में कांग्रेस के छह विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की थी, जिसके बाद विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था। इसके बाद इन विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया। इसके बाद राज्य सरकार ने संशोधन विधेयक लाकर उनकी पेंशन रोकने का प्रयास किया था।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि विधानसभा द्वारा लाया गया संशोधन कानून पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जा सकता, बल्कि यह केवल भविष्य के मामलों पर ही लागू होगा। यानी पहले से अयोग्य घोषित विधायकों के अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।
इस फैसले के बाद सियासी बयानबाजी भी तेज हो गई है। भाजपा ने इसे न्यायपालिका की जीत बताते हुए सुक्खू सरकार पर राजनीतिक द्वेष का आरोप लगाया, वहीं कांग्रेस सरकार के खिलाफ इसे “कानून के दुरुपयोग” का मामला बताया गया।
पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह लोकतंत्र और संविधान की मर्यादा की जीत है, जबकि सरकार की नीतियां बदले की भावना से प्रेरित रही हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजनीतिक फैसलों में कानूनी संतुलन बनाए रखना जरूरी नहीं है, और क्या विधायकों के अधिकारों को कानून के जरिए सीमित किया जा सकता है।
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