सोनीपत निगम चुनाव में कांग्रेस क्यों हारी? सामने आए बड़े कारण
सोनीपत नगर निगम चुनाव 2026 में भाजपा की बड़ी जीत और कांग्रेस की हार के पीछे संगठन, भीतरघात, गुटबाजी और बूथ मैनेजमेंट जैसे कई बड़े कारण सामने आए हैं।
सोनीपत नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के कई कारण सामने आए
भीतरघात, गुटबाजी और बागियों से जूझती रही कांग्रेस
भाजपा को मजबूत बूथ मैनेजमेंट और राजीव जैन की पकड़ का फायदा मिला
सोनीपत नगर निगम चुनाव 2026 में भाजपा की बड़ी जीत और कांग्रेस की करारी हार को लेकर राजनीतिक विश्लेषण सामने आया है। वरिष्ठ पत्रकार बीएस मलिक ने चुनाव परिणामों को केवल उम्मीदवारों की लोकप्रियता नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति, अनुशासन और ग्राउंड लेवल मैनेजमेंट का नतीजा बताया है।
चुनाव में कांग्रेस मेयर उम्मीदवार कमल दीवान को 23,247 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। वहीं 22 वार्डों में कांग्रेस केवल पांच पार्षद सीटों तक सीमित रह गई। दूसरी ओर भाजपा ने संगठनात्मक मजबूती और बूथ स्तर तक मजबूत पकड़ के दम पर बड़ी जीत दर्ज की।
बीएस मलिक के अनुसार कांग्रेस चुनाव के दौरान कई मोर्चों पर बिखरी हुई दिखाई दी। पार्टी का संगठन जमीन पर कमजोर नजर आया, जबकि भाजपा पूरी रणनीति और अनुशासन के साथ मैदान में उतरी।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस लंबे समय बाद संगठन मजबूत करने के दावे जरूर करती रही, लेकिन चुनाव में उसका असर दिखाई नहीं दिया। स्थानीय नेता और कार्यकर्ता अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा पाए, जिसका सीधा नुकसान पार्टी को उठाना पड़ा।
राजनीतिक विश्लेषण में यह भी कहा गया कि कांग्रेस उम्मीदवार कमल दीवान की राजनीतिक पकड़ और जनसंपर्क भाजपा उम्मीदवार राजीव जैन की तुलना में कमजोर नजर आया। लगातार चुनाव लड़ने से जो नेटवर्क और अनुभव विकसित होता है, वह कमल दीवान के पक्ष में नहीं दिखा।
बीएस मलिक के मुताबिक कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी अंदरूनी गुटबाजी रही। पूरे चुनाव में केवल हुड्डा समर्थक गुट सक्रिय दिखाई दिया, जबकि कुमारी शैलजा और रणदीप सुरजेवाला खेमे की सक्रियता लगभग नजर नहीं आई। एससी वोट बैंक को साधने के लिए भी कुमारी शैलजा को प्रचार में नहीं उतारा गया।
उन्होंने कहा कि प्रदेश नेतृत्व भी केवल बैठकों तक सीमित रहा। मैदान में मुख्य रूप से दीपेंद्र हुड्डा ही सक्रिय दिखाई दिए।
टिकट वितरण भी कांग्रेस के लिए बड़ा संकट बना। कई पुराने कार्यकर्ताओं ने टिकट कटने पर नाराजगी जताई। इसके बाद कई नेता निर्दलीय मैदान में उतर गए, जबकि कुछ ने पार्टी में रहते हुए भीतरघात किया।
बीएस मलिक ने कहा कि पिछली बार भी कमल दीवान भीतरघात का शिकार हुए थे और इस बार भी स्थिति लगभग वैसी ही रही। कांग्रेस अपने बागी नेताओं को मनाने में असफल रही, जिसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ा।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस का चुनाव संगठन आधारित कम और “कमल दीवान का व्यक्तिगत चुनाव” ज्यादा नजर आया। बूथ और गली स्तर पर कांग्रेस कमजोर रही, जबकि भाजपा का नेटवर्क लगातार सक्रिय रहा।
सोनीपत में करीब 75 हजार पंजाबी वोटर होने के बावजूद कांग्रेस उन्हें पूरी तरह अपने पक्ष में नहीं कर पाई। पार्टी ने पंजाबी चेहरे के रूप में कमल दीवान को मैदान में उतारा और कई पंजाबी नेताओं को प्रचार में बुलाया, लेकिन भरोसे का माहौल नहीं बना सकी।
बीएस मलिक के अनुसार कांग्रेस स्थानीय मुद्दों को भी प्रभावी तरीके से नहीं उठा पाई। वार्ड स्तर पर अलग घोषणापत्र जारी करने की बात हुई थी, लेकिन केवल एक कॉमन घोषणापत्र जारी किया गया। जबकि हर वार्ड की समस्याएं अलग-अलग थीं।
वहीं भाजपा की जीत के पीछे मजबूत संगठन सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आया। भाजपा ने चुनाव को केवल बड़े नेताओं की सभाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि बूथ और गली स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखा।
मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और स्थानीय नेता लगातार चुनाव प्रचार में जुटे रहे। भाजपा कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क किया, जिससे पार्टी की पकड़ मजबूत होती गई।
विश्लेषण में भाजपा उम्मीदवार राजीव जैन की व्यक्तिगत पकड़ को भी जीत का बड़ा कारण बताया गया। शहर के व्यापारी वर्ग, सामाजिक संगठनों और अलग-अलग वर्गों में उनकी मजबूत पकड़ दिखाई दी।
बीएस मलिक ने कहा कि राजीव जैन ने अपने पिछले नौ महीनों के कार्यकाल में किए गए विकास कार्यों को चुनावी मुद्दा बनाया। उन्होंने जनता के बीच जाकर अपने काम गिनाए और अधूरे कार्य पूरे कराने का भरोसा दिलाया।
भाजपा में अनुशासन और डैमेज कंट्रोल भी मजबूत दिखाई दिया। पार्टी ने बगावत करने वाले नेताओं पर तुरंत कार्रवाई की और भीतरघात को सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आने दिया।
उन्होंने कहा कि भाजपा का प्रचार अभियान ज्यादा संगठित और आक्रामक रहा। यही वजह रही कि भाजपा मतदाताओं का भरोसा जीतने में सफल रही, जबकि कांग्रेस कई स्तरों पर कमजोर साबित हुई।
pooja