सोनीपत ट्रैक पर नियमित चलेगी हाइड्रोजन ट्रेन, ट्रायल शुरू

जींद से भम्भेवा के बीच हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल रन शुरू। इंजन, ब्रेकिंग सिस्टम और सुरक्षा मानकों की जांच। सफल परीक्षण के बाद सोनीपत ट्रैक पर नियमित संचालन की संभावना।

सोनीपत ट्रैक पर नियमित चलेगी हाइड्रोजन ट्रेन, ट्रायल शुरू

जींद से भम्भेवा के बीच हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल शुरू
इंजन की गति, ब्रेकिंग सिस्टम और सुरक्षा मानकों की होगी जांच
सफल रहा परीक्षण तो सोनीपत ट्रैक पर नियमित संचालन की मिल सकती है हरी झंडी


हरियाणा के जींद में बुधवार सुबह देश की आधुनिक रेल तकनीक की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया गया, जब हाइड्रोजन ट्रेन का बहुप्रतीक्षित ट्रायल रन शुरू हुआ। सुबह करीब साढ़े आठ बजे ट्रेन को जींद रेलवे स्टेशन से रवाना किया गया। यह ट्रेन जींद से भम्भेवा स्टेशन तक चलाई जा रही है, जहां विभिन्न तकनीकी पहलुओं की गहन जांच की जाएगी। रेलवे विभाग की तकनीकी टीम सुबह से ही स्टेशन परिसर और ट्रैक पर तैयारियों में जुटी रही।

ट्रायल के दौरान ट्रेन के इंजन की गति, ब्रेकिंग सिस्टम, ईंधन खपत, और सुरक्षा मानकों का बारीकी से परीक्षण किया जाएगा। विशेषज्ञ यह भी देखेंगे कि हाइड्रोजन फ्यूल सेल सिस्टम किस प्रकार काम कर रहा है और इंजन की परफॉर्मेंस ट्रैक की मौजूदा स्थिति के अनुरूप है या नहीं। इसके साथ ही ट्रैक की मजबूती, सिग्नलिंग सिस्टम की सटीकता और ट्रेन के समग्र संतुलन पर विशेष नजर रखी जाएगी।

रेलवे अधिकारियों के अनुसार यदि आज का ट्रायल पूरी तरह सफल रहता है तो इस ट्रेन को जींद से सोनीपत ट्रैक पर नियमित रूप से चलाने की प्रक्रिया तेज कर दी जाएगी। यह न केवल हरियाणा के लिए, बल्कि भारतीय रेलवे के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। हाइड्रोजन आधारित तकनीक को अपनाने की दिशा में यह अहम पहल है, जो भविष्य में पारंपरिक डीजल इंजनों की जगह ले सकती है।

इस ट्रेन के संचालन से क्षेत्र के यात्रियों को प्रदूषण मुक्त, आधुनिक और शांत रेल सेवा का लाभ मिलेगा। हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनें कार्बन उत्सर्जन को लगभग शून्य कर देती हैं, जिससे पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी। रेलवे विभाग ने सुरक्षा के मद्देनजर ट्रायल के दौरान आम लोगों से ट्रैक के पास न जाने की अपील की है।

यदि परीक्षण सफल रहता है तो जल्द ही इस ट्रेन के नियमित संचालन को हरी झंडी मिल सकती है और हरियाणा देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां भविष्य की हरित रेल तकनीक पटरियों पर दौड़ती नजर आएगी।

.

क्या है हाइड्रोजन ट्रेन और क्यों है यह खास?

हाइड्रोजन रेल क्या है और कैसे काम करती है? आसान शब्दों में कहें तो यह ट्रेन न तो डीजल से चलती है और न ही ऊपर लगे बिजली के तारों से। इसकी छत पर हाइड्रोजन टैंक और फ्यूल सेल लगे होते हैं। जब टैंक से हाइड्रोजन और बाहर की हवा से ऑक्सीजन आपस में मिलते हैं, तो एक रासायनिक अभिक्रिया (Chemical Reaction) होती है। इस प्रक्रिया से बिजली पैदा होती है, जो ट्रेन की मोटरों को घुमाती है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में इंजन से धुआं नहीं, बल्कि केवल पानी की बूंदें और भाप (Water Vapor) बाहर निकलती हैं।

तकनीक में क्या बदलाव हैं और इसे ऐतिहासिक क्यों माना जा रहा? भारतीय रेलवे अब तक डीजल या बिजली पर निर्भर रही है। जहाँ बिजली की लाइनें नहीं हैं, वहाँ डीजल ही एकमात्र विकल्प था, जो बहुत ज्यादा प्रदूषण फैलाता है। हाइड्रोजन ट्रेन को ऐतिहासिक इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह बिना बिजली के तारों के भी शून्य कार्बन उत्सर्जन के साथ चल सकती है। तकनीक के मामले में, इसमें लीथियम-आयन बैटरी का भी इस्तेमाल किया गया है, जो ब्रेक मारते समय पैदा होने वाली ऊर्जा को स्टोर कर लेती है। भारत में बना यह इंजन 1200 हॉर्स पावर की क्षमता रखता है, जो इसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन इंजनों में से एक बनाता है।

हाइड्रोजन ट्रेन के फायदे:

  1. पर्यावरण का मित्र: इससे प्रदूषण बिल्कुल नहीं होता, जो ग्लोबल वार्मिंग के दौर में बेहद जरूरी है।

  2. शोर से मुक्ति: यह ट्रेन डीजल इंजन के मुकाबले बहुत शांत चलती है, जिससे ध्वनि प्रदूषण कम होता है।

  3. कम मेंटेनेंस: डीजल इंजनों की तुलना में इसके रखरखाव का खर्च काफी कम है क्योंकि इसमें जटिल पुर्जे कम होते हैं।

  4. ऊर्जा सुरक्षा: भारत को अब विदेशों से महंगे डीजल के आयात पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

हाइड्रोजन ट्रेन के नुकसान और चुनौतियां:

  1. भारी लागत: एक हाइड्रोजन ट्रेन बनाने का खर्च करीब 80 करोड़ रुपये आता है, जो सामान्य ट्रेन से काफी ज्यादा है।

  2. ईंधन का उत्पादन: हाइड्रोजन को पानी से अलग करना (Electrolysis) एक खर्चीली प्रक्रिया है, जिसके लिए बहुत अधिक बिजली चाहिए।

  3. भंडारण (Storage): हाइड्रोजन एक अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, जिसे स्टोर करना और स्टेशनों तक पहुँचाना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरा है।

  4. इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी: अभी हमारे पास हाइड्रोजन फिलिंग स्टेशन नहीं हैं, जिन्हें बनाने में बड़ा निवेश लगेगा।