खाना न बनाना क्रूरता नहीं, घरेलू काम पति की भी जिम्मेदारी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक मामले में कहा कि पत्नी का खाना न बनाना क्रूरता नहीं है और घरेलू कामकाज पति-पत्नी दोनों की जिम्मेदारी है।
■ पत्नी का खाना न बनाना क्रूरता नहीं: सुप्रीम कोर्ट
■ पति को भी घरेलू जिम्मेदारियां निभानी होंगी
■ तलाक केस में बदलते समाज पर कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने तलाक से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान समाज को बड़ा संदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पत्नी का खाना न बनाना या घरेलू कामकाज में कमी होना क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि विवाह किसी नौकरानी से नहीं, बल्कि एक जीवनसाथी से होता है, जहां दोनों की बराबर भागीदारी जरूरी है।
यह टिप्पणी जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने दी। बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि समय के साथ समाज में बदलाव आया है और अब पति को भी घर के कामों में समान जिम्मेदारी निभानी चाहिए। केवल पत्नी से ही सभी घरेलू कार्यों की अपेक्षा करना उचित नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा कि आधुनिक जीवनशैली में पति-पत्नी दोनों कामकाजी हो सकते हैं, ऐसे में घर की जिम्मेदारियां भी साझा होनी चाहिए। खाना बनाना या घर संभालना सिर्फ महिला की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह दोनों की साझी भूमिका है।
हालांकि, कोर्ट ने इस मामले में अभी अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। बेंच ने पति-पत्नी दोनों को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है, ताकि पूरे मामले को बेहतर तरीके से समझा जा सके और उचित निर्णय लिया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज में महिलाओं की भूमिका और सम्मान को लेकर भी एक बड़ा संदेश देती है। यह फैसला पारिवारिक मामलों में समानता और आपसी सहयोग की जरूरत को रेखांकित करता है।
Akhil Mahajan