बिश्नोई समाज के बड़े नेता और हरियाणा के सबसे बुजुर्ग पूर्व विधायक सहीराम धारणिया नहीं रहे
हरियाणा के सबसे बुजुर्ग पूर्व विधायक सहीराम धारणिया का 104 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे 40 साल तक बिश्नोई महासभा के अध्यक्ष रहे और समाज सेवा में सक्रिय रहे।
हरियाणा के सबसे बुजुर्ग पूर्व विधायक सहीराम धारणिया का 104 वर्ष की उम्र में निधन
बिना चश्मे के अखबार पढ़ते थे, 40 साल तक बिश्नोई महासभा के अध्यक्ष रहे
देश विभाजन के समय 15 हजार लोगों को पाकिस्तान से भारत लेकर आए थे
हरियाणा के सबसे बुजुर्ग पूर्व विधायक और अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के पूर्व अध्यक्ष सहीराम धारणिया का 104 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने शुक्रवार सुबह करीब 4 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही परिवार, रिश्तेदारों और समाज के लोगों में शोक की लहर दौड़ गई।
सिरसा जिले के सकताखेड़ा गांव में उनका अंतिम संस्कार बिश्नोई समाज की रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाएगा। परिवार के अनुसार उनकी बेटी राजस्थान के जोधपुर से पहुंचने के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होगी।
सहीराम धारणिया वर्ष 1957 में अबोहर विधानसभा सीट से जनसंघ के टिकट पर विधायक चुने गए थे। वे बिश्नोई समाज से विधायक बनने वाले पहले व्यक्ति माने जाते हैं। राजनीति के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक जीवन में भी लंबा योगदान दिया।
वे लगातार 40 वर्षों तक अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के अध्यक्ष रहे। समाज के लोगों का कहना है कि सहीराम धारणिया ने पूरे जीवन समाज सेवा और लोगों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके दोहते सोमप्रकाश के मुताबिक सहीराम धारणिया का जन्म पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की बहावलपुर रियासत के तालिया गांव में हुआ था। देश विभाजन के समय वे लगभग 14 से 15 हजार लोगों का जत्था लेकर भारत आए थे। उन्होंने इन लोगों के पुनर्वास में भी बड़ी भूमिका निभाई और सरकार से उनका क्लेम दिलवाने में मदद की।
बताया गया कि उन्होंने उस दौर में “गहने बेचो, हथियार खरीदो” अभियान भी चलाया था। खुद का क्लेम उन्होंने करीब 20 साल बाद लगाया, जबकि पहले दूसरों की मदद करने में लगे रहे। बाद में उन्हें और उनके परिवार को सिरसा जिले के सकताखेड़ा गांव में जमीन अलॉट हुई, जहां वे स्थायी रूप से बस गए।
सहीराम धारणिया ने शुरुआती पढ़ाई पंजाब प्रांत के मोगा में की थी। बाद में उन्होंने लाहौर पंजाब यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री हासिल की। विभाजन के बाद उन्होंने लंबे समय तक वकालत भी की और समाज सेवा से जुड़े रहे।
उनके परिवार के अनुसार उन्हें अखबार पढ़ने का बेहद शौक था। 104 साल की उम्र में भी वे बिना चश्मे के अखबार पढ़ लेते थे। वे सादा जीवन, खेतीबाड़ी और चिंता मुक्त दिनचर्या को अपनी लंबी उम्र का कारण बताते थे।
सहीराम धारणिया हिंदी आंदोलन से भी जुड़े रहे और इस दौरान जेल भी गए। वे लॉर्ड शिवा कॉलेज के संरक्षक भी रहे। समाज के लोग उन्हें एक सादगीपूर्ण, ईमानदार और प्रेरणादायक व्यक्तित्व के रूप में याद कर रहे हैं।
Akhil Mahajan