जब बाल हनुमान ने निगल लिया था पूरा सूर्य, देवताओं में मच गया था हड़कंप

जानिए भगवान हनुमान की वह अद्भुत कथा जब उन्होंने बाल अवस्था में सूर्य को फल समझकर निगल लिया था और पूरी सृष्टि में अंधकार छा गया था।

जब बाल हनुमान ने निगल लिया था पूरा सूर्य,  देवताओं में मच गया था हड़कंप
  • जब हनुमान जी ने निगल लिया था पूरा सूर्य
  • देवताओं में मच गया था हड़कंप
  • इंद्र के वज्र से टूटी हनुमान जी की ठोड़ी, तभी पड़ा नाम ‘हनुमान’

भगवान Hanuman से जुड़े अनेक चमत्कारी और अद्भुत प्रसंग हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित हैं, लेकिन एक ऐसा किस्सा भी है जिसने देवताओं तक को भयभीत कर दिया था। यह घटना उस समय की है जब बाल रूप में हनुमान जी अपनी दिव्य शक्तियों से स्वयं भी अनजान थे।

कथा के अनुसार, एक सुबह बाल हनुमान अत्यंत भूखे थे। तभी उनकी नजर आकाश में चमकते हुए लाल-पीले सूर्य पर पड़ी। बाल मन ने सूर्य को एक पका हुआ फल समझ लिया। बस फिर क्या था, वे तेज गति से आकाश की ओर उड़ चले।

कहा जाता है कि हनुमान जी की उड़ान इतनी तेज थी कि देवताओं के बीच हड़कंप मच गया। वे सीधे सूर्यदेव की ओर बढ़े और देखते ही देखते पूरे सूर्य को अपने मुख में निगल लिया।

सूर्य के लुप्त होते ही पूरे ब्रह्मांड में अंधकार छा गया। पृथ्वी पर हाहाकार मच गया। दिन में रात जैसा दृश्य दिखाई देने लगा। देवता भयभीत हो उठे कि यदि सूर्य बाहर नहीं आया तो सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाएगा।

तब सभी देवता Indra देव के पास पहुंचे। इंद्रदेव ने बाल हनुमान को रोकने के लिए अपने वज्र का प्रयोग किया। वज्र हनुमान जी की ठोड़ी पर लगा, जिससे वे घायल होकर धरती पर गिर पड़े।

बताया जाता है कि इसी चोट के कारण उनकी ठोड़ी टेढ़ी हो गई थी। संस्कृत में ठोड़ी को “हनु” कहा जाता है। इसी कारण उनका नाम “हनुमान” पड़ा।

जब Vayu देव को यह पता चला कि उनके पुत्र हनुमान घायल हो गए हैं, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने पूरी सृष्टि में वायु का प्रवाह रोक दिया। सांस रुकने से देवता, मनुष्य और सभी जीव-जंतु परेशान हो गए।

इसके बाद सभी देवता बाल हनुमान के पास पहुंचे और उन्हें अनेक दिव्य वरदान दिए। Brahma ने उन्हें अजेय होने का वरदान दिया, जबकि इंद्रदेव ने भी अपनी भूल स्वीकार करते हुए उन्हें अमरता और अतुल शक्ति का आशीर्वाद दिया।

मान्यता है कि उसी दिन से हनुमान जी को अष्ट सिद्धि और नव निधियों का स्वामी माना जाने लगा। यही कारण है कि उन्हें संकटमोचन, बल-बुद्धि और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।

यह कथा केवल चमत्कार नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि दिव्य शक्ति और सच्ची भक्ति के सामने देवताओं को भी झुकना पड़ता है।