हिसार में सज्जन उर्फ काला को जमानत, गैंग कनेक्शन साबित नहीं
■ Summary Description (Meta Tags – Hindi) हिसार कोर्ट ने संगठित अपराध मामले में सज्जन उर्फ काला को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि केवल पुराने केसों के आधार पर गैंग का सदस्य साबित नहीं किया जा सकता।
■ हिसार कोर्ट से सज्जन उर्फ काला को जमानत
■ कोर्ट बोली- पुराने केस गिरोह का सदस्य साबित नहीं करते
■ पुलिस गैंग से कनेक्शन का सबूत पेश नहीं कर पाई
हिसार की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. गगनदीप मित्तल की अदालत ने संगठित अपराध के एक मामले में आरोपी सज्जन उर्फ काला को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 के तहत किसी आरोपी पर केस दर्ज करने के लिए केवल पुराने मुकदमों का होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने अपराध किसी क्राइम सिंडिकेट के सदस्य के रूप में किया हो। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि बिना ठोस संयुक्त अपराध के उदाहरण के इतनी गंभीर धारा लगाना उचित नहीं है।
अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि पुलिस ऐसा कोई ठोस रिकॉर्ड पेश नहीं कर पाई, जिससे यह साबित हो सके कि सज्जन उर्फ काला ने कथित विनोद काणा गैंग के साथ मिलकर कोई साझा अपराध किया हो। अदालत ने यह भी माना कि जांच पूरी हो चुकी है और इस मामले के अन्य सह-आरोपी पहले ही जमानत पर हैं। ऐसे में समानता के आधार पर आरोपी को 50 हजार रुपए के मुचलके और एक जमानती पर नियमित जमानत दे दी गई।
मामले के अनुसार नारनौंद थाना पुलिस ने 14 नवंबर 2025 को गुप्त सूचना के आधार पर विनोद उर्फ काणा और उसके कथित गैंग के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। पुलिस का आरोप था कि जेल से बाहर आने के बाद उसने गैंग बनाकर रंगदारी, फायरिंग और दहशत फैलाने का काम शुरू किया। इसी केस में सज्जन उर्फ काला को भी आरोपी बनाया गया और 19 नवंबर 2025 को उसे प्रोडक्शन वारंट पर गिरफ्तार किया गया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि आरोपी पर वर्ष 2011 से 2025 के बीच 18 केस दर्ज हैं, लेकिन इनमें से कई मामलों में वह बरी हो चुका है और कुछ मामलों में सजा पूरी कर चुका है। अदालत ने कहा कि पुराने मामलों को तब तक ‘कंटिन्यूइंग अनलॉफुल एक्टिविटी’ नहीं माना जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि वे अपराध किसी गिरोह के सदस्य के रूप में किए गए थे।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि पुलिस ने इस मामले में हत्या से जुड़ी गंभीर धारा लगा दी, जबकि केस में किसी की मृत्यु का जिक्र तक नहीं था। सुनवाई के दौरान सरकारी वकील भी इस धारा की प्रासंगिकता को लेकर स्पष्ट जवाब नहीं दे सके, जिससे पुलिस का पक्ष कमजोर नजर आया।
बचाव पक्ष के वकील जेएस राठी ने अदालत में दलील दी कि आरोपी को झूठा फंसाया गया है और उस पर गलत तरीके से संगठित अपराध की धारा लगाई गई है। उन्होंने कहा कि 18 पुराने मामलों को आधार बनाकर धारा 111 लागू नहीं की जा सकती, क्योंकि कई मामलों में आरोपी बरी हो चुका है और कुछ में सजा पूरी कर चुका है। वकील ने यह भी बताया कि एफआईआर दर्ज होने के समय आरोपी पहले से जेल में था और उससे कोई हथियार भी बरामद नहीं हुआ, जिससे पुलिस का केस और कमजोर हो जाता है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आरोपी को जमानत दे दी।
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