गैस संकट में लौटा पुराना दौर, अब लकड़ियों की आंच पर पक रहा शादियों का खाना

गैस संकट के कारण हरियाणा में शादियों और ढाबों की रसोई बदल गई है। पानीपत और मुरथल में अब गैस की जगह लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर खाना पकाया जा रहा है।

गैस संकट में लौटा पुराना दौर, अब लकड़ियों की आंच पर पक रहा शादियों का खाना

➤ गैस संकट के कारण शादियों और ढाबों में लकड़ी-कोयले पर बनने लगा खाना
➤ पानीपत, सोनीपत और गुरुग्राम के मैरिज पैलेस में कॉमर्शियल गैस की भारी कमी
➤ मुरथल के ढाबों ने भी बदली रसोई, इंडक्शन और भट्ठियों का सहारा


पानीपत। कभी गांवों की शादियों में बड़े-बड़े कड़ाहों के नीचे जलती लकड़ी की भट्ठियां आम नजारा हुआ करती थीं। समय बदला तो गैस सिलेंडरों ने उस धुएं भरे दौर की जगह ले ली। लेकिन हालात ऐसे बने कि हरियाणा की शादियों में एक बार फिर वही पुरानी तस्वीर लौटती दिखाई दे रही है। गैस की किल्लत के चलते अब कई मैरिज पैलेस और ढाबों की रसोई में सिलेंडर नहीं, बल्कि लकड़ियों और कोयले की आग जल रही है और उसी पर दावतें तैयार हो रही हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के चलते गैस सप्लाई प्रभावित होने का असर अब हरियाणा तक पहुंच गया है। शादी के सीजन में पानीपत, सोनीपत और गुरुग्राम जैसे बड़े जिलों में कैटरर्स और आयोजकों को कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडर नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में उन्हें मजबूरन पुराने तरीकों का सहारा लेना पड़ रहा है।

पानीपत की शादियों में लकड़ी-कोयला बना सहारा

पानीपत शहर और आसपास करीब 50 से ज्यादा बड़े बैंकेट हॉल और मैरिज पैलेस हैं, जहां रोजाना शादियों और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। आमतौर पर यहां भोजन तैयार करने के लिए बड़ी मात्रा में कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों का इस्तेमाल किया जाता था।

लेकिन पिछले कुछ दिनों से कॉमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई लगभग ठप हो गई है। ऐसे में आयोजकों और हलवाइयों ने पुराने तरीके अपनाने शुरू कर दिए हैं। कई जगह बड़े-बड़े चूल्हे बनाकर लकड़ी और कोयले पर खाना तैयार किया जा रहा है।

हलवाई बोले: 4 घंटे का काम अब पूरे दिन में

पानीपत के प्रसिद्ध हलवाई बंटू बताते हैं कि करीब 500 मेहमानों वाली एक शादी में सामान्य तौर पर 15 से 20 कॉमर्शियल सिलेंडरों की जरूरत होती है। लेकिन हाल ही में एक बड़े ऑर्डर के दौरान उन्हें केवल 6 सिलेंडर ही मिल पाए।

ऐसे में काम रोकना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने तुरंत लकड़ियों का इंतजाम किया। बंटू के अनुसार जो खाना गैस भट्ठियों पर लगभग 4 घंटे में तैयार हो जाता था, उसे लकड़ी की आग पर पकाने में सुबह से रात तक का समय लग गया। आग को लगातार संभालना पड़ता है और धुएं से काम करना भी मुश्किल हो जाता है।

पानीपत में लकड़ियों के सहारे खाना बनाता हुआ कारीगर।

टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर भी मंडराया संकट

गैस संकट का असर सिर्फ शादियों तक सीमित नहीं है। पानीपत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री भी इससे प्रभावित हो रही है। शहर में करीब 250 से अधिक छोटी-बड़ी इकाइयां हैं, जिनमें डाई हाउस और कंबल उद्योग शामिल हैं और ये कॉमर्शियल एलपीजी पर निर्भर हैं।

उद्योग जगत से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि जल्द ही गैस सप्लाई सामान्य नहीं हुई तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे विदेशी ऑर्डर रद्द होने का खतरा है और हजारों मजदूरों के रोजगार पर असर पड़ सकता है।

मुरथल के ढाबों में भी बदली रसोई

गैस संकट का असर अब मुरथल के प्रसिद्ध ढाबों तक पहुंच चुका है। ढाबा संचालकों ने वैकल्पिक इंतजाम करने शुरू कर दिए हैं। कुछ ढाबों में अतिरिक्त भट्ठियां लगाई गई हैं तो कुछ ने इंडक्शन चूल्हों का सहारा लिया है।

मुरथल के एक ढाबे में चूल्हे पर खाना बनाते कारीगर।

मुरथल ढाबा एसोसिएशन के प्रतिनिधि मंजीत सिंह के अनुसार गैस की कमी का सबसे ज्यादा असर छोटे ढाबा संचालकों पर पड़ा है। बड़े ढाबों के पास कुछ विकल्प हैं, लेकिन छोटे ढाबों के लिए यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण बन गई है।

70% तक घटा गैस का इस्तेमाल

मुरथल के मशहूर रेशम ढाबा के मैनेजर मंगत राम बताते हैं कि गैस संकट के कारण उनके यहां गैस का इस्तेमाल लगभग 70 प्रतिशत तक कम कर दिया गया है। अब गैस का उपयोग केवल तवे पर रोटी और पराठे बनाने जैसे सीमित कामों के लिए किया जा रहा है। बाकी ज्यादातर व्यंजन लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर ही तैयार किए जा रहे हैं।

पहले बेस किचन में रेड और व्हाइट ग्रेवी, कढ़ाई पनीर, बटर मसाला, मिक्स वेज, येलो दाल और दाल मखनी जैसे लगभग 10 से 12 आइटम गैस पर तैयार होते थे, लेकिन अब इन्हें भी लकड़ी की आंच पर पकाया जा रहा है।

सरकार भी तलाश रही विकल्प

गैस संकट के बीच हरियाणा सरकार वैकल्पिक ईंधन के तौर पर पीडीएस आधारित केरोसिन वितरण पर भी विचार कर रही है। केंद्र सरकार की ओर से प्रदेश को 8.76 लाख लीटर केरोसिन ऑयल आवंटित किया गया है। खाद्य एवं आपूर्ति विभाग इसकी वितरण व्यवस्था का खाका तैयार कर रहा है, ताकि जरूरतमंद परिवारों को राहत मिल सके।