निरंकारी मिशन: प्रेम, करुणा और समाजिक समरसता का संदेश

78वां निरंकारी संत समागम समालखा में सेवा, समर्पण और मानवता का महा उत्सव, सतगुरु माता सुदीक्षा जी और निरंकारी राजपिता रमित जी ने सेवा स्थल का उद्घाटन किया, लाखों श्रद्धालुओं ने एकत्व और भक्तिमय आनंद का अनुभव किया।

निरंकारी मिशन: प्रेम, करुणा और समाजिक समरसता का संदेश


➤ 78वां निरंकारी संत समागम: सेवा, समर्पण और मानवता का दिव्य उत्सव
➤ सतगुरु माता सुदीक्षा जी और निरंकारी राजपिता रमित जी ने किया सेवा स्थल का उद्घाटन
➤ लगभग 600 एकड़ में फैला महा समागम, लाखों श्रद्धालुओं ने अनुभव किया एकत्व और भक्तिमय आनंद

अशोक शर्मा, समालखा 



विविधताओं से भरे इस संसार में जहाँ मानवता अनेक रूपों, भाषाओं, संस्कृतियों, जातियों और धर्मों में विभाजित दिखाई देती है, वहीं एक शाश्वत सत्य है जो सभी को एक सूत्र में पिरोता है। संत निरंकारी मिशन पिछले 96 वर्षों से ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अर्थात् ‘समस्त संसार एक परिवार’ की दिव्य भावना को जीवंत करता आया है। मिशन न केवल प्रेम, शांति और समरसता का संदेश देता है, बल्कि सत्संग, सेवा और विशाल संत समागमों के माध्यम से इसे व्यवहार में भी उतारता है।

इस वर्ष भी वार्षिक 78वां निरंकारी संत समागम सेवा और मानवता की भावना के साथ सम्पन्न हुआ। समागम की शुरुआत एक अत्यंत भावपूर्ण क्षण के साथ हुई, जब सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी ने अपने पावन कर-कमलों से सेवा स्थल का उद्घाटन किया। इस शुभ अवसर पर मिशन की कार्यकारिणी समिति, केंद्रीय सेवादल अधिकारीगण और हजारों श्रद्धालु उपस्थित थे, सभी निःस्वार्थ सेवा और श्रद्धा में रत दिखाई दिए।

सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने उपस्थित भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि समागम केवल एकत्रित होने का नाम नहीं है, यह सेवा और आत्मिक प्रतिबद्धता का प्रबल भाव है। उन्होंने कहा कि हमें अपने अंतर्मन में झांककर जीवन की वास्तविक दिशा को समझना चाहिए, अपने अंदर की कमियों का सुधार करना चाहिए और सभी में परमात्मा का रूप देखना चाहिए। सेवा करते हुए मन भक्तिमय बनता है और यही समागम का वास्तविक उद्देश्य है।

लगभग 600 एकड़ में फैले समागम स्थल पर सेवा, निवास, भोजन, स्वास्थ्य, आवागमन और सुरक्षा जैसी सभी व्यवस्थाएँ पूर्ण श्रद्धा और निःस्वार्थ भाव से संचालित की जाती हैं। देश-विदेश से आए संतजन, सेवा में रत महात्मा और हर वर्ग के श्रद्धालु इस महा उत्सव में सम्मिलित होकर एकत्व, समर्पण और आत्मिक आनंद का अनुभव करते हैं।

समागम का उद्देश्य केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि समाज में मानवता, करुणा और सेवा भाव को जागृत करना भी है। इस दिव्य आयोजन में शामिल होकर श्रद्धालु न केवल परमात्मा के करीब आते हैं, बल्कि सामूहिक सेवा और सामाजिक समरसता का भी अनुभव करते हैं।