■ प्रयागराज में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर पॉक्सो एक्ट के तहत FIR
■ कोर्ट के आदेश पर झूंसी थाने में दर्ज हुआ मामला, शिष्य मुकुंदानंद भी नामजद
■ आरोपों को शंकराचार्य ने बताया फर्जी, निष्पक्ष जांच की मांग
प्रयागराज में नाबालिग बच्चों के यौन शोषण के आरोपों को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। पॉक्सो कोर्ट के आदेश पर झूंसी थाना में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई है। मामले में उनके शिष्य मुकुंदानंद का नाम भी शामिल है। थाना प्रभारी महेश मिश्रा के अनुसार, 2-3 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भी पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।
यह कार्रवाई जगद्गुरु रामभद्राचार्य के शिष्य आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज की याचिका पर हुई। उन्होंने 8 फरवरी को स्पेशल पॉक्सो कोर्ट में शिकायत दाखिल की थी और दो बच्चों को कोर्ट में पेश कर गंभीर आरोप लगाए थे। 13 फरवरी को स्पेशल जज विनोद कुमार चौरसिया ने सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया था। बाद में अदालत ने माना कि आरोप गंभीर और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं तथा पुलिस जांच आवश्यक है। कोर्ट ने संबंधित थाना प्रभारी को तत्काल FIR दर्ज कर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम को खाली कर बच्चों के बयान दर्ज किए गए। बयान कैमरे में रिकॉर्ड किए गए। कोर्ट ने कहा था कि ऐसे मामलों में यदि पुलिस जांच जरूरी हो तो FIR दर्ज करना उचित है, ताकि साक्ष्य एकत्र किए जा सकें और पीड़ितों की पहचान व गरिमा की रक्षा हो सके।
शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने कहा कि पुलिस में सुनवाई न होने के कारण उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। उनका दावा है कि शिष्यों के साथ यौन शोषण हुआ है और न्यायालय के आदेश से उन्हें न्याय की उम्मीद जगी है। उन्होंने यह भी कहा कि वे न्याय के लिए यात्रा शुरू करेंगे।
वहीं, अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोपों को निराधार बताया है। उनका कहना है कि यह मुकदमा उन्हें बदनाम करने के लिए कराया गया है। उन्होंने कहा कि जांच में पूरा सहयोग करेंगे और सच सामने आएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि यह विवाद माघ मेले के दौरान हुए मतभेदों के बाद बढ़ा है।
शंकराचार्य ने यह भी कहा कि न्यायालय की प्रक्रिया का सम्मान किया जाएगा और वे कानूनी तरीके से अपना पक्ष रखेंगे। उनका कहना है कि आरोप राजनीतिक और व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित हैं।
पुलिस का कहना है कि कोर्ट के निर्देशों के अनुसार निष्पक्ष जांच की जाएगी। सभी पक्षों के बयान, दस्तावेज और उपलब्ध साक्ष्य एकत्र किए जाएंगे। पॉक्सो अधिनियम के तहत मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पीड़ितों की पहचान गोपनीय रखी जाएगी।