बड़ी खबर: हरियाणा में असुरक्षित रक्त चढ़ाने से दो बच्चे निकले HIV, प्रधानमंत्री तक पहुंचा मामला, PMO से जांच के आदेश
हरियाणा में थैलेसीमिया से पीड़ित दो बच्चों में ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद HIV संक्रमण की पुष्टि हुई है। PMO के निर्देश पर केंद्रीय एजेंसियां जांच कर रही हैं और ब्लड बैंकों में नेट टेस्टिंग अनिवार्य करने की मांग उठी है।
■ नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद दो बच्चों में HIV संक्रमण की पुष्टि
■ PMO में शिकायत के बाद केंद्रीय एजेंसियों को जांच के निर्देश
■ ब्लड बैंकों में नेट टेस्टिंग अनिवार्य करने की उठी मांग
फरीदाबाद जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था को झकझोर देने वाला गंभीर मामला सामने आया है। यहां थैलेसीमिया से पीड़ित दो बच्चों में HIV संक्रमण की पुष्टि हुई है। दोनों बच्चों को नियमित रूप से रक्त चढ़ाया जाता था, लेकिन हालिया ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद संक्रमण का पता चलने से परिजनों और सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश है। इस घटना ने रक्त जांच प्रणाली और ब्लड बैंकों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामले को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए थैलेसीमिया मरीजों के लिए काम करने वाली संस्था ‘फाउंडेशन अगेंस्ट थैलेसीमिया’ के महासचिव रविंद्र डुडेजा ने PMO ऑफिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत पर संज्ञान लेते हुए संबंधित एजेंसियों को जांच के निर्देश जारी किए गए हैं। इसके बाद केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) और राज्य के औषधि नियंत्रण विभाग की टीमें जांच में जुट गई हैं। उनका फोकस इस बात पर है कि रक्त जांच या आपूर्ति की प्रक्रिया में चूक कहां और कैसे हुई।
प्राथमिक स्तर पर यह आशंका जताई जा रही है कि रक्तदाता संक्रमण के तथाकथित ‘विंडो पीरियड’ में रहा हो सकता है। इस अवधि में सामान्य जांच से HIV का पता नहीं चल पाता। विशेषज्ञों के अनुसार प्रचलित एलाइजा जांच में एंटीबॉडी की पहचान की जाती है, जबकि संक्रमण के शुरुआती चरण में एंटीबॉडी विकसित होने में समय लगता है। यही वजह है कि इस तरह के मामलों में अत्याधुनिक जांच प्रणाली की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
सामाजिक संगठनों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने सभी ब्लड बैंकों में नेट टेस्टिंग (NAT Testing) अनिवार्य करने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यह तकनीक संक्रमण का प्रारंभिक स्तर पर भी पता लगाने में सक्षम है और इससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सकता है। साथ ही रक्त की गुणवत्ता की पारदर्शी निगरानी और किसी भी स्तर पर लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी की जा रही है।
गौरतलब है कि थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रक्त रोग है, जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाने वाला प्रोटीन है, जो शरीर के अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाता है। इस बीमारी से पीड़ित मरीजों को बार-बार रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है, क्योंकि उनकी लाल रक्त कोशिकाएं जल्दी नष्ट हो जाती हैं। थैलेसीमिया के प्रमुख प्रकार माइनर और मेजर होते हैं। समय पर जांच और नियमित उपचार से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।
स्वास्थ्य विभाग के ड्रग कंट्रोल ऑफिसर कृष्ण कुमार गर्ग के मुताबिक मामले की जांच जारी है और रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट रूप से कुछ कहा जा सकेगा। फिलहाल पूरा स्वास्थ्य तंत्र इस संवेदनशील मामले पर नजर बनाए हुए है।
थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रक्त विकार है, जो माता-पिता से जीन के माध्यम से बच्चों में पहुंचता है। इस बीमारी में शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाने वाला वह प्रोटीन है, जो शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। जब हीमोग्लोबिन कम बनता है तो शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है और व्यक्ति जल्दी थकान, कमजोरी और एनीमिया का शिकार हो जाता है।
थैलेसीमिया मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है — थैलेसीमिया माइनर और थैलेसीमिया मेजर। माइनर में लक्षण हल्के हो सकते हैं और कई बार व्यक्ति को पता भी नहीं चलता। लेकिन मेजर प्रकार में बच्चे को जन्म के कुछ महीनों बाद ही बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है।
थैलेसीमिया के प्रमुख लक्षण
-
शरीर में अत्यधिक कमजोरी और थकान
-
चेहरा या त्वचा का पीला पड़ना
-
बच्चों में विकास की धीमी गति
-
पेट के ऊपरी हिस्से में सूजन (तिल्ली बढ़ना)
-
बार-बार संक्रमण होना
-
सांस फूलना या चक्कर आना
गंभीर मामलों में नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता होती है, क्योंकि शरीर स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं जल्दी नष्ट कर देता है।
बचाव कैसे करें
चूंकि यह एक जेनेटिक बीमारी है, इसलिए इसका सीधा इलाज नहीं बल्कि रोकथाम अधिक महत्वपूर्ण है।
-
विवाह से पहले या परिवार बढ़ाने की योजना से पहले थैलेसीमिया स्क्रीनिंग टेस्ट करवाना चाहिए।
-
यदि दोनों माता-पिता थैलेसीमिया माइनर हैं तो बच्चे में मेजर होने की संभावना बढ़ जाती है।
-
गर्भावस्था के दौरान डॉक्टर की सलाह से प्रि-नेटल जांच करवाई जा सकती है।
-
जागरूकता अभियान और स्कूल-कॉलेज स्तर पर रक्त जांच से समय रहते पहचान संभव है।
-
नियमित इलाज और डॉक्टर की निगरानी में रहने से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।
Akhil Mahajan