मासिक धर्म अब मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला बदलेगा करोड़ों छात्राओं की जिंदगी

सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार घोषित करते हुए स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन, बेहतर शौचालय और जागरूकता से जुड़े सख्त निर्देश जारी किए हैं।

मासिक धर्म अब मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला बदलेगा करोड़ों छात्राओं की जिंदगी

➤ सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार घोषित किया
➤ स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन और बेहतर सुविधाएं अनिवार्य
➤ केंद्र राज्यों को तीन महीने में आदेश लागू करने की समयसीमा


देश में महिलाओं और किशोरियों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी 2026 को एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का हिस्सा घोषित कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता और सुविधाओं तक पहुंच किसी भी लड़की के लिए केवल सुविधा नहीं, बल्कि उसका मौलिक अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर की याचिका पर सुनाया, जिसमें कहा गया था कि मासिक धर्म स्वच्छता की कमी के कारण लाखों छात्राएं न केवल मानसिक और शारीरिक परेशानी झेलती हैं, बल्कि उनकी शिक्षा भी प्रभावित होती है। अदालत ने माना कि यदि एक बच्ची को सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल नहीं मिलता, तो वह अपने शिक्षा के अधिकार और प्रजनन स्वास्थ्य का सही तरीके से उपयोग नहीं कर सकती।

अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही, स्कूलों में लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग, पूरी तरह कार्यशील शौचालय, साफ पानी, साबुन और हाथ धोने की सुविधाएं अनिवार्य रूप से होनी चाहिए।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि प्रत्येक स्कूल में मासिक धर्म स्वच्छता कॉर्नर बनाए जाएं, जहां आपात स्थिति के लिए अतिरिक्त इनरवियर, यूनिफॉर्म और डिस्पोजेबल बैग उपलब्ध हों। इसके अलावा, सैनिटरी कचरे के सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल निपटान के लिए विशेष व्यवस्था करने के आदेश भी दिए गए हैं।

शिक्षा व्यवस्था में बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी और एससीईआरटी को निर्देश दिया है कि पाठ्यक्रम में मासिक धर्म से जुड़ा जेंडर-संवेदनशील कंटेंट शामिल किया जाए, ताकि सामाजिक वर्जनाओं और भ्रांतियों को खत्म किया जा सके। अदालत ने यह भी कहा कि केवल महिला शिक्षक ही नहीं, बल्कि पुरुष शिक्षकों को भी संवेदनशील बनाया जाए, ताकि छात्राएं बिना झिझक अपनी समस्या साझा कर सकें।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन सभी निर्देशों को तीन महीने के भीतर सख्ती से लागू करने का आदेश दिया है। यह फैसला न केवल शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने वाला है, बल्कि समाज में मासिक धर्म को लेकर लंबे समय से चली आ रही चुप्पी और भेदभाव को तोड़ने की दिशा में भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है।