वोट नहीं, दुआएं कमाने वाले ननहेड़ा बंधु: समालखा में सेवा का नया अध्याय

समालखा विधानसभा क्षेत्र में राजेश और संजय ननहेड़ा द्वारा चलाई गई निःस्वार्थ सेवा, जिसमें मुफ्त आटा चक्की और भोजन शामिल है, ने उन्हें जनता का सच्चा नायक बना दिया है। यह कहानी बताती है कि कैसे चुनाव के बाद भी सेवा जारी रहती है, और सरकारी बजट का इंतजार किए बिना निजी खर्च पर विकास कार्य हो रहे हैं।

वोट नहीं, दुआएं कमाने वाले ननहेड़ा बंधु: समालखा में सेवा का नया अध्याय

➤निःस्वार्थ सेवा ने राजेश ननहेड़ा को जनता का नायक बनाया

➤फ्री आटा चक्की और भोजन ने वोट नहीं केवल दुआएं कमाई

➤सरकारी बजट का इंतजार नहीं करते, अपनी जेब से विकास


जितेंद्र एहलावत



सियासत की दुनिया में अक्सर हमने देखा है कि चुनावी मौसम में नेताओं की 'सेवा' की गंगा बह निकलती है, पर जैसे ही मतदान की स्याही सूखती है, सेवा का वह सैलाब भी सूख जाता है। "सौ सुनार की, एक लोहार की" की तर्ज़ पर, हरियाणा के समालखा विधानसभा क्षेत्र में दो भाइयों ने एक ऐसी मिसाल पेश की है, जो राजनीति की "आए राम, गए राम" वाली रीत से कोसों दूर, विशुद्ध मानवता और सेवाधर्म पर टिकी है।

यह कहानी है राजेश ननहेड़ा और उनके बड़े भाई संजय ननहेड़ा की, जिन्होंने निस्वार्थ सेवा को महज चुनावी जुमला नहीं, बल्कि जीवन का सच्चा संकल्प बना लिया है। गांव-गांव में घूमती मुफ्त आटा चक्की मशीनें, गरीबों को निःशुल्क भोजन और वोट की चिंता किए बिना केवल दुआएं कमाने का यह भाव ही उन्हें राजनीति के भीड़ से अलग खड़ा करता है।

समालखा की जनता के लिए आज राजेश ननहेड़ा केवल एक नाम नहीं, बल्कि सेवा और विश्वास का पर्याय बन चुके हैं। उनकी गरीबों की मदद और निस्वार्थ सेवा ने उन्हें वह सम्मान दिया है, जो शायद ही किसी पारंपरिक नेता को कभी नसीब हुआ हो।

डाबोला गांव से शुरू हुई उनकी "आटा चक्की सेवा" अब पूरे हलके में "टॉक ऑफ द टाउन" बन चुकी है। यह सेवा उन असहाय परिवारों तक पहुँचती है, जिनके लिए आटा पिसवाना भी एक बड़ा खर्च है। राजेश ननहेड़ा का ध्येय स्पष्ट है: “हमारा उद्देश्य राजनीति की बिसात बिछाना नहीं, बल्कि सेवा का दीप जलाना है। जो लोग स्वयं असमर्थ हैं, उन्हें सुविधा देना हमारा कर्तव्य है।”उनके इस कदम ने साबित कर दिया है कि "सेवा परमो धर्म:" केवल किताबों में लिखी बात नहीं है।

यह बात समालखा के लोगों को सर्वाधिक प्रभावित करती है कि ननहेड़ा बंधु "दूर रहकर भी पास" हैं। राजेश ननहेड़ा मुंबई से और उनके बड़े भाई संजय ननहेड़ा सुदूर अमेरिका से बैठकर भी लगातार अपने क्षेत्र की सेवा में "पलक-पांवड़े बिछाए" रहते हैं।

गांव वालों का कहना है कि धन-दौलत की उन्हें कोई कमी नहीं है, लेकिन उनके दिल में केवल जनसेवा की भावना है। हर रोज़ हज़ारों गरीब परिवारों को निःशुल्क भोजन कराना, इस बात का प्रमाण है।

एक ग्रामीण ने भावनाओं से भरकर कहा, “राजेश और संजय ननहेड़ा का दिल इतना विशाल है कि कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। अगर ये दोनों विधानसभा का चुनाव लड़ते हैं, तो यह हरियाणा की राजनीति का "मील का पत्थर" साबित होगा।”

इस युग के नेताओं के विपरीत, ननहेड़ा बंधु "सरकारी बजट का इंतज़ार नहीं" करते।

गांव के बुजुर्ग गर्व से कहते हैं कि राजेश ननहेड़ा काम के लिए सरकारी फाइलों में "अटकाने-भटकाने" में विश्वास नहीं रखते। उनकी कार्यशैली है: “काम को लेट नहीं करेंगे, सरकार के पैसों का इंतज़ार नहीं, अपनी जेब से ही काम करा देंगे।”

आज उनके क्षेत्र में चार आटा चक्की मशीनें निरंतर सेवा में लगी हैं, जो गरीबों को मुफ्त या बेहद सस्ती दरों पर आटा पिसवाने की सुविधा दे रही हैं। यह पहल इस मुहावरे को चरितार्थ करती है कि "इच्छा हो तो मार्ग मिलते हैं।"

समालखा की जनता की आवाज़ भी कहती है कि “राजेश और संजय ननहेड़ा हमारे लिए अब सिर्फ नेता नहीं, परिवार के सदस्य जैसे हैं। ये गरीब का दर्द समझते हैं, बिना किसी स्वार्थ के सेवा करते हैं।”

लोगों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में, मनमोहन बडाना को मंत्री और राजेश व संजय ननहेड़ा को विधायक के रूप में देखना ही "इलाके की जनता की सच्ची दिली इच्छा" है।

बता दें कि समालखा की धरती ने कई राजनीतिक हस्तियाँ देखी हैं, पर जनसेवक केवल कुछ ही हुए हैं। आज जब राजनीति पर से लोगों का भरोसा "उठा जा रहा है", ननहेड़ा भाइयों की यह निस्वार्थ पहल समाज में एक नई उम्मीद जगाती है।

यह कहानी सिद्ध करती है कि अगर इरादे "गंगाजल की तरह साफ" हों और दिल में सेवा का भाव हो, तो आपको सत्ता नहीं, बल्कि समाज और जनता का अटूट साथ मिलता है। वे समालखा की जनता के दिलों में 'जन-नायक' के रूप में बस चुके हैं।