जहरीले जानवरों के बीच फंसा इलाका : ड्रेन फटने से 500 एकड़ क्षेत्र डूबा

झज्जर जिले के बहादुरगढ़- दिल्ली बॉर्डर पर मुंगेशपुर ड्रेन का एक किलोमीटर हिस्सा टूटकर करीब 500 एकड़ खेत, एमआईई औद्योगिक क्षेत्र व कॉलोनियां जलमग्न। सेना व प्रशासन की कोशिशों से मरम्मत कार्य जारी। प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल।

जहरीले जानवरों के बीच फंसा इलाका : ड्रेन फटने से 500 एकड़ क्षेत्र डूबा

➤ मुंगेशपुर ड्रेन का लगभग 1 किलोमीटर हिस्सा बहादुरगढ़- दिल्ली बॉर्डर पर टूटकर करीब 500 एकड़ खेत, इंडस्ट्रियल एरिया, गीतांजलि कॉलोनी व झाड़ौदा गांव जलमग्न।
➤ सेना के 80 जवान व प्रशासन के 100+ कर्मचारी मिलकर मिट्टी के बोरे, नावों व ट्रैक्टर से ड्रेन की मरम्मत में जुटे।
➤ प्रशासनिक लापरवाही के कारण ड्रेन टूटना बना समस्या, स्थायी समाधान न होने से किसानों को फसल व आजीविका का संकट।

झज्जर जिले के बहादुरगढ़-दिल्ली बार्डर पर बह रही मुंगेशपुर ड्रेन इन दिनों इलाके की किस्मत बनती जा रही है। करीब एक किलोमीटर के टूटे किनारे से पानी uncontrolled होकर बहादुरगढ़ के करीब 500 एकड़ खेत, एमआईई पार्ट बी इंडस्ट्रियल एरिया की फैक्ट्रियां, दिल्ली की गीतांजलि कॉलोनी और झाड़ौदा गांव में घुस गया। सब्जियां, फसलें और पशु बाड़े जलमग्न हो गए।

मुंगेशपुर ड्रेन को ठीक करते हुए कर्मचारी और सेना जवान।

स्थिति इतनी गंभीर थी कि एसडीआरएफ और स्थानीय प्रशासन के प्रयास से हालात काबू में नहीं आ सके। इस पर सेना की एक कंपनी को बुलाया गया। शुक्रवार दोपहर को 80 जवान मौके पर पहुंचे और शनिवार से मिट्टी के कट्टे भरकर टूटे हिस्से को ठीक करने में जुट गए। मिट्टी की सप्लाई 5 किलोमीटर दूर से ट्रैक्टर-ट्रॉली में कराकर की जा रही है। नावों की मदद से कट्टे टूटे किनारे तक पहुंचाए जा रहे हैं।

किसान नरसिंह राठी ने बताया कि उनका जटवाड़ा गांव का लगभग 80 एकड़ फसल वाला खेत पूरी तरह पानी में डूब गया। सरकार से बार-बार ड्रेन की सफाई की गुहार लगाई गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

मुंगेशपुर ड्रेन को ठीक करने में जुटे सेना जवान और कर्मचारी। - Dainik Bhaskar

एसडीएम नसीब फोगाट ने बताया कि दिल्ली प्रशासन ने सफाई नहीं करवाई, जिसके कारण अधिक पानी आने पर किनारा टूट गया। उम्मीद जताई जा रही है कि रविवार तक ड्रेन का किनारा ठीक हो जाएगा।

किसानों ने आगाह किया कि यह समस्या बार-बार आएगी यदि स्थायी समाधान व दोनों राज्यों की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। उनका कहना है कि यह सिर्फ फसल का नुकसान नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का संकट बन चुका है।